TulsidasHanumanChalisa : जेल में रची गई हनुमान चालीसा और प्रकट हुई हनुमान सेना ;- अकबर ने तुलसीदास जी की भक्ति और स्वाभिमान से प्रभावित होकर उन्हें यमुना नदी के किनारे 96 बीघा जमीन दान में देने की पेशकश की थी. लेकिन संत तुलसीदास जी तो मोह-माया और धन-दौलत से बहुत दूर रहते थे. उन्होंने इस जमीन को अपने पास रखने से साफ इनकार कर दिया. इसके बाद अकबर ने वह जमीन उनके प्रिय शिष्य गणपत राय के नाम पर ट्रांसफर कर दी. इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जब भारत में अंग्रेजों का राज आया, तो उन्होंने इस जमीन को अपने कब्जे में ले लिया. बदले में वे हर साल 684 रुपये का किराया देने लगे. आजादी के बाद 1972 तक जिला कलेक्टर ऑफिस से यह पैसा मिलता रहा, जिसके बाद इसे बंद कर दिया गया।
पुराने ग्रंथों में मिलते हैं अकबर और तुलसीदास की मुलाकात के सबूत
उस दौर के महान कवि नाभादास ने अपनी प्रसिद्ध किताब भक्तमाल में तुलसीदास जी के जीवन का पूरा वर्णन किया है. नाभादास जी ने लिखा है कि तुलसीदास जी उम्र में अकबर से लगभग 10 साल बड़े थे. इसके अलावा तुलसीदास जी के शिष्य वेणीमाधव ने मूल गोसाई चरित नाम की किताब लिखी थी. इन दोनों ही रचनाओं में इस बात का साफ जिक्र है कि तुलसीदास जी की मुलाकात दिल्ली के बादशाह यानी अकबर से हुई थी. इन ग्रंथों से यह भी साफ होता है कि तुलसीदास जी ने अकबर और उनके बेटे जहांगीर, दोनों का दौर अपनी आंखों से देखा था।
अकबर के नवरत्नों से थी तुलसीदास जी की गहरी दोस्ती
मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल राजा टोडरमल और महान कवि अब्दुल रहीम खानखाना से तुलसीदास जी के बहुत करीबी रिश्ते थे. अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने ही तुलसीदास जी को बनारस के अस्सी घाट पर रहने के लिए एक घर दिया था. टोडरमल जी के निधन के बाद उनके बेटों ने अपनी संपत्ति के बंटवारे के लिए तुलसीदास जी को ही अपना पंच बनाया था. वहीं रहीम जी तो तुलसीदास जी को पिता समान मानते थे. एक बार जब एक गरीब ब्राह्मण अपनी बेटी की शादी के लिए मदद मांगने तुलसीदास जी के पास आया, तो उन्होंने एक पर्ची लिखकर उसे रहीम के पास भेज दिया. रहीम ने उस गरीब ब्राह्मण की पूरी मदद की और तुलसीदास जी के सम्मान में एक सुंदर दोहा भी लिखा।
जब अकबर ने तुलसीदास जी को जेल में डाल दिया
तुलसीदास जी और अकबर से जुड़ी सबसे विख्यात जनश्रुति हनुमान चालीसा की रचना से जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि जब तुलसीदास जी की ख्याति बहुत बढ़ गई, तो अकबर ने उन्हें फतेहपुर सीकरी स्थित अपने दरबार में बुलवाया. अकबर ने उनसे कहा कि या तो वे भगवान श्रीराम से उनकी मुलाकात करवाएं या फिर बादशाह की तारीफ में कोई बड़ा ग्रंथ लिखें. तुलसीदास जी ने राजा की गुलामी करने से साफ मना कर दिया. इस बात से गुस्सा होकर अकबर ने उन्हें फौरन गिरफ्तार करवा लिया और कारागार में बंद कर दिया. तुलसीदास जी पूरे 40 दिनों तक अकबर की जेल में कैद रहे।
जेल की कालकोठरी में रहते हुए तुलसीदास जी ने भगवान हनुमान का ध्यान किया और वहीं पर हनुमान चालीसा की रचना की. जैसे ही 40वें दिन उनका पाठ पूरा हुआ, मुगल सल्तनत पर एक बहुत बड़ा चमत्कार हुआ. अचानक लाखों बंदरों के एक बड़े झुंड ने अकबर के महल और पूरे फतेहपुर सीकरी पर हमला बोल दिया. बंदरों ने महल के अंदर भारी तबाही मचाई और मुगल सैनिक भी उन्हें रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे. जब महल में हाहाकार मच गया, तो मंत्रियों की सलाह पर अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ. अकबर ने तुरंत तुलसीदास जी को जेल से रिहा कर दिया और उनसे माफी मांगी. जैसे ही तुलसीदास जी बाहर आए, सारे बंदर अपने आप वहां से चले गए।

