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Reading: RoopkundSkeletonLake : बर्फ पिघलते ही बाहर आते हैं सैकड़ों कंकाल
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RoopkundSkeletonLake : बर्फ पिघलते ही बाहर आते हैं सैकड़ों कंकाल

बर्फ पिघलते ही जाग उठते हैं कंकाल.

admin
Last updated: 2026/08/27 at 11:04 AM
admin
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4 Min Read
RoopkundSkeletonLake
RoopkundSkeletonLake : बर्फ पिघलते ही बाहर आते हैं सैकड़ों कंकाल
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Highlights
  • द्वितीय विश्व युद्ध के जापानी सैनिक या अंग्रेजों की दहशत?
  • नंदा देवी का भयानक श्राप या आसमानी आफत?
  • विज्ञान का सबसे अजीब खुलासा.

RoopkundSkeletonLake : बर्फ पिघलते ही बाहर आते हैं सैकड़ों कंकाल :-  सोचिए, आप 16,500 फीट ऊंचे पहाड़ पर चढ़ें, बर्फ के पास पहुंचे और पानी की तरफ देखते ही आपकी रूह कांप जाए… झील में तैरती हुई मछलियां नहीं, बल्कि सैकड़ों चमचमाती इंसानी खोपड़ियां और हड्डियां आपकी तरफ घूर रही हों. यह किसी हॉरर फिल्म का सीन नहीं, बल्कि हमारे अपने उत्तराखंड की रूपकुंड झील का वो खौफनाक सच है, जिसे पूरी दुनिया ‘कंकालों की झील’ के नाम से जानती है।

Contents
बर्फ पिघलते ही जाग उठते हैं कंकालद्वितीय विश्व युद्ध के जापानी सैनिक या अंग्रेजों की दहशत?नंदा देवी का भयानक श्राप या आसमानी आफत?विज्ञान का सबसे अजीब खुलासा

रूपकुंड झील सिर्फ एक टूरिस्ट स्पॉट नहीं, बल्कि कुदरत और इतिहास का सबसे अनसुलझा, अजीबोगरीब और रोमांचक ड्रामा है. अगर आप भी एडवेंचर के शौकीन हैं, तो मई के आखिरी हफ्ते या सितंबर-अक्टूबर के दौरान इस भयानक और रहस्यमयी ‘कंकालों की झील’ का दीदार करने का प्लान बना सकते हैं. लेकिन याद रखिएगा, यहां का पानी जितना ठंडा है, इसका इतिहास उतना ही रोंगटे खड़े कर देने वाला!

बर्फ पिघलते ही जाग उठते हैं कंकाल

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित रूपकुंड झील साल के ज्यादातर महीने बर्फ की सफेद चादर में ढकी रहती है. लेकिन जैसे ही मई-जून की गर्मी में बर्फ पिघलना शुरू होती है, पानी के नीचे छिपा एक डरावना नजारा सामने आ जाता है. झील के किनारे और उसके ठंडे पानी में तैरती हैं 700 से 800 इंसानी खोपड़ियां और कंकाल. खास बात यह है कि यहां के हड्डियों पर मांस, बाल और सूखे अंग आज भी इस तरह महफूज हैं, मानो ये लोग कल ही काल के गाल में समाए हों।

द्वितीय विश्व युद्ध के जापानी सैनिक या अंग्रेजों की दहशत?

साल 1942 में जब एक फॉरेस्ट रेंजर ने पहली बार इस झील की खोज की, तो अंग्रेजों के पसीने छूट गए. अंग्रेजों को लगा कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना भारत में घुसने की कोशिश कर रही थी और बर्फ में जमकर मर गई. लेकिन जब वैज्ञानिकों की टीम ने जांच की, तो अंग्रेजों के होश उड़ गए! ये हड्डियां किसी आधुनिक सैनिक की नहीं, बल्कि सैकड़ों साल पुरानी थीं।

नंदा देवी का भयानक श्राप या आसमानी आफत?

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सालों पहले कन्नौज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती रानी और पूरे लाव-लश्कर के साथ नंदा देवी के दर्शन करने निकले थे. उन्होंने ढोल-नगाड़ों और नर्तकियों के साथ इस पवित्र जगह की मर्यादा तोड़ी. इससे देवी नंदा इतनी क्रोधित हुईं कि उन्होंने क्रिकेट की गेंद जितने बड़े लोहे जैसे ओलों की ऐसी खौफनाक बारिश की कि राजा-रानी समेत पूरा का पूरा काफिला वहीं ढह गया और हमेशा के लिए बर्फ में जम गया।

विज्ञान का सबसे अजीब खुलासा

हालिया रिसर्च ने इस रहस्य को और ज्यादा गहरा कर दिया है. डीएनए टेस्ट से पता चला है कि ये कंकाल किसी एक घटना या एक ही देश के लोगों के नहीं हैं! इनमें से कुछ भारतीय मूल के हैं, तो कुछ ग्रीस (यूनान) और साउथ-ईस्ट एशिया के लोगों के हैं. यानी अलग-अलग दौर में, अलग-अलग देशों से आए यात्री यहां मौत की नींद सो गए. बर्फ का तापमान इतना कम है कि सदियां बीत जाने के बाद भी ये कंकाल गलने का नाम नहीं ले रहे।

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