PahariLaalChawal : सेहत के लिए अमृत है पहाड़ी लाल चावल :- उत्तराखंड के पहाड़ों पर मिलता है अमृत का स्वाद जिसको कहते हैं रेड राईस ….. लाल चावल’, जो सिर्फ स्वाद में ही नहीं, बल्कि सेहत के मामले में भी सफेद चावल से कहीं आगे है. बागेश्वर और आसपास के पहाड़ी इलाकों में इसे सदियों से सर्दियों में खाने का रिवाज है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यह चावल शरीर को अंदर से गर्म रखता है, तुरंत ऊर्जा देता है और ठंड से लड़ने की ताकत देता है. लाल चावल पोषक तत्वों का असली खजाना है. इसमें सफेद चावल से कई गुना ज्यादा आयरन, फाइबर, मैग्नीशियम और विटामिन B-कॉम्प्लेक्स पाया जाता है. यह शरीर में खून की कमी दूर करता है, पाचन को ठीक रखता है और शरीर से गंदगी (टॉक्सिन) बाहर निकालने में मदद करता है।
उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल (जैसे बागेश्वर, पिथौरागढ़, टिहरी, उत्तरकाशी) के सीढ़ीनुमा खेतों में यह चावल पारंपरिक तरीके से उगाया जाता है. यह खेती सिर्फ बारिश के पानी पर निर्भर होती है और इसमें किसी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता. ठंडी जलवायु और पहाड़ी मिट्टी की वजह से इसका स्वाद और पौष्टिकता मैदानी इलाकों के चावलों से बिल्कुल अलग होती है. इसमें भरपूर प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं जो आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।
उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों रानीखेत, मुनस्यारी, बागेश्वर और आसपास के इलाकों में लाल चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है. नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर बताते हैं कि लाल चावल सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर होता है. इसका लाल रंग एंथोसायनिन नामक प्राकृतिक तत्व के कारण होता है, जो एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है।
स्वाद और सेहत के प्रति जागरूक लोगों की वजह से देहरादून, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी इसकी डिमांड कई गुना बढ़ गई है. लोग अब इसे ऑनलाइन ऑर्डर कर रहे हैं, जिससे किसानों को भी अच्छे दाम 120 से 200 रुपये प्रति किलो) मिल रहे हैं।
सर्दियों में पहाड़ों में लाल चावल की खीर तो हर घर में बनती है. इसे पारंपरिक तरीके से धीमी आंच पर दूध में पकाया जाता है और फिर गुड़ या शहद, देसी घी और मेवों के साथ परोसा जाता है. यह खीर शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देने के साथ-साथ बच्चों और बुजुर्गों के लिए बेहतरीन पौष्टिक आहार मानी जाती है।

