GlobalWarming : क्या है तापमान में ‘1 डिग्री’ का मतलब ? :- हम अक्सर सुबह उठकर फोन पर वेदर रिपोर्ट देखते हैं और अगर कल के मुकाबले पारा 1 डिग्री ऊपर-नीचे हो जाए, तो हमें कोई खास फर्क नहीं पड़ता. लेकिन जब वैज्ञानिक यही बात कहते हैं कि पूरी दुनिया का औसत तापमान ‘1 डिग्री’ बढ़ गया है, तो उनके माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। शायद सुनने में 1 डिग्री बहुत छोटा सा बदलाव लगे, लेकिन ग्लोबल लेवल पर ये 1 डिग्री इंसानी लाइफस्टाइल, खेती, समंदर और आने वाले कल को तहस-नहस करने की ताकत रखता है. आइए समझते हैं कि आखिर ‘ग्लोबल वार्मिंग’, ‘जलवायु परिवर्तन’ और ‘मौसम’ में क्या अंतर है और ये 1 डिग्री का गणित इतना डरावना क्यों है।
तीनों में क्या है अंतर?
अक्सर बातचीत में इन तीनों शब्दों को एक ही तराजू में तौला जाता है, लेकिन ये तीनों बिल्कुल अलग हैं. आइए आसान उदाहरण से समझते है:
दरअसल मौसम बिल्कुल मूड की तरह होता है, जो पल-पल में बदलता रहता है. सुबह तेज धूप थी, दोपहर में अचानक काले बादल छाए और बारिश शुरू हो गई ये मौसम है. मौसम किसी खास जगह का कुछ घंटों या कुछ दिनों का मिजाज होता है।
वहीं, ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) इंसान की खराब आदतों का नतीजा है. जब इंसान अपनी गाड़ियों से अंधाधुंध पेट्रोल-डीजल फूंकते हैं, फैक्ट्रियां चलाते हैं और कोयला जलाते हैं, तो हवा में ‘ग्रीनहाउस गैसें’ (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) बढ़ जाती हैं. ये गैसें सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं और उसे अंतरिक्ष में वापस नहीं जाने देतीं. इससे पूरी धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, इसी को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।
बात करें जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की तो ये ग्लोबल वार्मिंग का अगला और बहुत बड़ा स्टेज है. तापमान बढ़ने की वजह से जब प्रकृति का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है, तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं. जैसे- अचानक कहीं भयानक सूखा पड़ना, कहीं बादल फट जाना, समंदर का जलस्तर बढ़ना और पहाड़ों की बर्फ (ग्लेशियर) का पिघलना॥
‘1 डिग्री’ Temperature बढ़ने से आफत क्यों?
दरअसल, सुबह के समय में तापमान 25 डिग्री होता है और दोपहर तक 38 डिग्री पहुंच जाता है. हमारी बॉडी 13-14 डिग्री का उतार-चढ़ाव एक दिन में झेल लेती है, तो पूरी पृथ्वी का तापमान सिर्फ 1 डिग्री बढ़ने पर इतनी चिंता क्यों ?
वैज्ञानिकों के अनुसार, स्थानीय स्तर पर तापमान का बदलना सामान्य है, लेकिन पूरी पृथ्वी का औसत तापमान 1 डिग्री बढ़ाने के लिए उतनी ही ऊर्जा (Energy) की जरूरत होती है, जितनी करोड़ों परमाणु बमों के फटने से निकलेगी. अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) के डेटा के मुताबिक, साल 1880 के बाद से अब तक धरती का औसत तापमान लगभग 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, और इसका सबसे बड़ा हिस्सा 1975 के बाद बढ़ा है, जब इंसानों ने मशीनों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा शुरू कर दिया।
जब पूरी पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री बढ़ता है, तो समंदर का पानी गर्म होकर फैलने लगता है, जिससे तटीय शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा, बारिश का चक्र पूरी तरह टूट जाता है, जो किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान करता है, क्योंकि इससे फसलों का पूरा सीजन बिगड़ जाता है।
सूर्य की ऊर्जा और हमारा भविष्य
बता दें कि पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा लेती है और एक तय मात्रा में उसे वापस अंतरिक्ष में भेज देती है. लेकिन इंसानो के जरिए फैलाई गई प्रदूषण इस ऊर्जा को रोक लेती है. साल 1951 से 1980 के बीच दुनिया का जो औसत तापमान करीब 14 डिग्री सेल्सियस हुआ करता था, वह अब तेजी से ऊपर भाग रहा है. वहीं, अगर लोगों की लाइफस्टाइल में बदलाव नहीं हुआ तो ये बढ़ता हुआ पारा जीने का ढर्रा पूरी तरह बदल देगा।

