JantarMantarDelhi : कैसे पड़ा जंतर मंतर नाम ? :- आपने एक नाम तो बहुत बार सुना होगा जंतर मंतर ….. राजधानी दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस के बीचों-बीच स्थित जंतर मंतर का निर्माण महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1724 में करवाया था. जंतर-मंतर प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है. मोहम्मद शाह के शासन काल में हिंदू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों में ग्रहों की स्थिति को लेकर बहस छिड़ गई थी. जयसिंह ने इसे खत्म करने के लिए जंतर-मंतर का निर्माण करवाया था. उन्होंने दिल्ली के साथ जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी इसका निर्माण कराया था।
जयपुर के जंतर मंतर को यूनेस्को ने 2010 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था. जंतर मंतर का निर्माण समय और अंतरिक्ष के अध्ययन के लिए करवाया गया था. यहां दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्यघड़ी है जिसे वृहत् सम्राट यंत्र कहते हैं. यह सूर्यघड़ी स्थानीय समय बताती है. ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार के उपकरण लगे हुए हैं।
सम्राट यंत्र
यह सूर्य की सहायता से वक्त और ग्रहों की स्थिति की जानकारी देता है।
मिस्र यंत्र
मिस्र यंत्र साल के सबसे छोटे और सबसे बड़े दिन के बारे में बताता है।
राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र
राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र खगोलीय पिंडों की गति के बारे में बताते हैं।
प्रदर्शनकारियों का गढ़ है जंतर मंतर
जंतर-मंतर में आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं. ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब यहां कोई धरना-प्रदर्शन न हो रहा हो. छोटे-मोटे प्रदर्शनों के अलावा जंतर-मंतर कई बड़े और ऐतिहासिक विरोध-प्रदर्शनों का गवाह रहा है। ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन से मौजूदा कॉकरोच आंदोलन तक जंतर मंतर ने देश दुनिया में ख़ास पहचान बनाई है।
महाराजा जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था
दिल्ली शहर के बीचों-बीच स्थित जंतर-मंतर खगोल विज्ञान का एक अद्भुत नमूना है, जो धूप-घड़ी (sundial) के रूप में बना है। इसे 1724 में जयपुर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। यह उन पाँच वेधशालाओं में से एक है, जिनमें से सबसे बड़ी जयपुर में है। बाकी वेधशालाएँ उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में हैं। इस वेधशाला का मुख्य मकसद खगोलीय चार्ट को समझना और इकट्ठा करना था, साथ ही ग्रहों, चंद्रमा और सूर्य की चाल को ट्रैक करके समय का पता लगाना था। पुराने समय के खगोल विज्ञान का एक शानदार नमूना होने के नाते, जंतर-मंतर आज के ज़माने में भी लोगों को प्रभावित करता है।
723 फ़ीट ऊँचे दिल्ली के जंतर-मंतर में 13 खगोलीय उपकरण हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं: मिश्र यंत्र, जयप्रकाश यंत्र, सम्राट यंत्र और राम यंत्र। लाल रंग में रंगे इस वेधशाला और इसके उपकरणों की समय-समय पर मरम्मत और देख-रेख की जाती रही है। इसकी धूप-घड़ी प्राचीन मिस्र की टॉलेमिक संरचना पर आधारित है और खगोलीय व्यवस्थाओं जैसे कि भूमध्य रेखा (equatorial), क्रांतिवृत्त (ecliptic) और क्षितिज-शीर्ष (horizon-zenith) स्थानीय व्यवस्था का पालन करती है।

