Pillar Construction : नदी के बीच कैसे बनता है पिलर ? :- आपने ऊंचे-ऊंचे हाईवे और रेलवे पुल तो देखे होंगे लेकिन क्या कभी सोचा है कि बहती नदी के बीच पिलर (pillar) की नींव कैसे डाली जाती है? जमीन पर तो खुदाई आसान होती है लेकिन नदी के तेज बहाव और गहराई में ये काम जान जोखिम में डालने जैसा होता है. मजदूरों का कलेजा मुंह को आ जाता है क्योंकि एक छोटी सी चूक सबकुछ बहा सकती है।
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इस चुनौती को पार करने के लिए इंजीनियरिंग की एक खास तकनीक अपनाई जाती है. जिसे कॉफर्डैम (Cofferdam) कहते हैं. ये एक अस्थाई जलरोधी संरचना होती है जिसकी मदद से नदी के बीच एक सूखा इलाका बनाया जाता है।
कैसे होता पिलर?
सबसे पहले इंजीनियर उस जगह की गहराई, मिट्टी की मजबूती और पानी के बहाव की रफ्तार का सर्वे करते हैं. फिर पुल का डिजाइन तैयार होता है. इसके बाद 10-20 मीटर लंबी स्टील शीट्स को हाइड्रोलिक हथौड़ों से नदी के तल में गाड़ा जाता है. इन्हें इंटरलॉक करके गोल या चौकोर दीवार बनाई जाती है, जो पानी को अंदर आने से रोकती है. फिर पंप की मदद से अंदर का पानी बाहर निकाला जाता है।
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जब कॉफर्डैम (cofferdam) के अंदर का हिस्सा पूरी तरह सूख जाता है तब मजदूर उसमें उतरते हैं और रेत, कीचड़, पत्थर हटाते हैं. जहां मिट्टी कमजोर होती है, वहां पाइल फाउंडेशन यानी लोहे की लंबी पाइप्स को 20-25 मीटर गहराई तक गाड़ा जाता है और फिर उस पर कंक्रीट का ढांचा बनता है ।
जोखिम भरा काम
ये काम इतना जोखिम भरा होता है कि भूकंप (Earthquake) या पानी के दबाव से सब कुछ तबाह हो सकता है. इसलिए सेंसर लगाकर लगातार मॉनिटरिंग की जाती है और मजदूरों को लाइफ जैकेट और हेलमेट पहनना अनिवार्य होता है. नदी ज्यादा गहरी हो तो क्या होगा ? अगर नदी ज्यादा गहरी हो तो कैसन टेक्निक अपनाई जाती है. इसमें बड़े जलरोधी बॉक्स नदी के तल पर उतारे जाते हैं और वहीं काम होता है.इसी तकनीक से जुड़े एक वीडियो ने सोशल मीडिया पर खूब तहलका मचाया है, जिसे देखकर लोग हैरान हैं कि इतनी मुश्किल जगह पर भी पुल की नींव रखी जा सकती है।

