यहीं से दोनों नदियों की सम्मलित धार गंगा कहलाती है। देहरादून, गर्मियों की छुट्टियों में सैर करें ठंडी हसीन वादियों की देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है।
7 वीं सदी में देवप्रयाग को ब्रह्मपुरी, ब्रह्म तीर्थ और श्रीखण्ड नगर जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता था।
देवप्रयाग को उत्तराखण्ड के रत्न के रूप में भी जाना जाता है।
श्री राम ने अलकनन्दा और भागीरथी नदी के संगम पर की थी तपस्या रुद्रनाथ मंदिर जहां महादेव का सिर यहां इंडिया में, तो वहीं धड़ नेपाल में पूजा जाता है यहां पहाड़ एक तरफ से अलकनंदा और दूसरी तरफ से भागीरथी आकर जिस बिंदु पर मिलते हैं वह दृश्य बेहद ही मनोरमी होता है।
संगम अलकनंदा बहुत कम आवाज करती है। वहीं भागीरथी बहुत ज्यादा शोर करते हुए बहती है। इन दोनों के बारे में कहा जाता है कि अलकनंदा बहू है और भागीरथी सास। यहां पहाड़ के तरफ से अलकनंदा और दूसरी तरफ से भागीरथी आकर जिस बिंदु पर मिलते हैं वह दृश्य बेहद ही मनोरमी होता है।
अलकनंदा के पानी का रंग नीला तथा भागीरथी का रंग हल्के हरे रंग का है देवप्रयाग भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है।
त्रेता युग में रावण और उसके परिजनों का वध करने के पश्चात् कुछ वर्ष अयोध्या में राज्य करके श्री राम ब्रह्म हत्या के दोष निवारण हेतु सीता जी और लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग में अलकनन्दा और भागीरथी नदी के संगम पर तपस्या करने आये थे।
केदारखण्ड में श्री राम का सीता जी और लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग पधारने का वर्णन मिलता है। इसक उल्लेख के अनुसार जहाँ गंगा जी का अलकनन्दा से संगम हुआ है और सीता-लक्ष्मण सहित श्री रामचन्द्र जी निवास करते हैं, देवप्रयाग के उस तीर्थ के समान न तो कोई तीर्थ हुआ और न होगा।
माना जाता है कि देव शर्मा नामक एक हिन्दू संत ने इस संगम स्थल पर कठिन तपस्या की थी, जिनके नाम पर इस स्थान का नाम ‘देवप्रयाग पड़ा। देवप्रयाग के विषय में कहा जाता है कि जब राजा भागीरथ ने माँ गंगा को पृथ्वी पर आने को मना लिया तो 33 करोड़ देवी-देवता भी उनके साथ स्वर्ग से उतरे। तब उन्होंने अपना आवास गंगा जी की जन्म भूमि, देवप्रयाग में बनाया। भागीरथी और अलकनंदा भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यहीं से पवित्र नदी गंगा का उद्भव हुआ है।

