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उत्तराखण्ड

CorbettTigerReserve : उत्तराखंड का रहस्यमयी कछुवा !

महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता.

admin
Last updated: 2026/10/31 at 11:49 AM
admin
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4 Min Read
CorbettTigerReserve
CorbettTigerReserve : उत्तराखंड का रहस्यमयी कछुवा !
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Highlights
  • वर्षों से एक ही रास्ते से मंदिर आता है कछुआ.
  • वैज्ञानिकों के लिए भी बना अध्ययन का विषय.
  • आस्था या प्राकृतिक व्यवहार, रहस्य बरकरार.

CorbettTigerReserve :  उत्तराखंड का रहस्यमयी कछुवा ! :-  उत्तराखंड के रामनगर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने आस्था के साथ-साथ वन्यजीव प्रेमियों की जिज्ञासा भी बढ़ा दी है. नैनीताल जिले के ढिकुली गांव में कॉर्बेट क्षेत्र के बफर जोन में स्थित गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर में कई वर्षों से शाम के समय एक विशालकाय कछुआ पहुंचता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, कछुआ लगभग तय समय पर मंदिर आता है, कुछ देर रुकता है, प्रसाद ग्रहण करता है और फिर जंगल की ओर लौट जाता है. इस अनोखी घटना को कोई धार्मिक आस्था से जोड़ रहा है तो कोई इसके पीछे भोजन और प्राकृतिक व्यवहार को वजह मान रहा है।

Contents
महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यतावर्षों से एक ही रास्ते से मंदिर आता है कछुआवैज्ञानिकों के लिए भी बना अध्ययन का विषयआस्था या प्राकृतिक व्यवहार, रहस्य बरकरार

महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता

गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर को लेकर स्थानीय क्षेत्र में कई प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं. जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर का संबंध महाभारत काल से माना जाता है. कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस इलाके में कुछ समय बिताया था और इसी दौरान यहां शिवलिंग की स्थापना की गई थी. स्थानीय मान्यता यह भी है कि शिवलिंग की स्थापना महाबली भीम ने की थी. जंगल और नदी-नालों के बीच स्थित यह मंदिर पहले से ही धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है।

वर्षों से एक ही रास्ते से मंदिर आता है कछुआ

ढिकुली निवासी और वन्यजीव प्रेमी संजय छिम्वाल के अनुसार, वह इस कछुए को कई वर्षों से मंदिर आते-जाते देख रहे हैं. उनका कहना है कि कछुआ शाम के वक्त मंदिर पहुंचता है और मंदिर के बाबा की ओर से उसे प्रसाद दिया जाता है. कुछ देर रुकने के बाद वह उसी रास्ते से वापस जंगल की तरफ चला जाता है. सबसे ज्यादा हैरानी इस बात को लेकर है कि कछुआ लंबे समय से लगभग एक ही समय और रास्ते से मंदिर पहुंच रहा है. हालांकि, इसे धार्मिक आस्था से जोड़ना विश्वास का विषय है, जबकि उसका लगातार एक जैसा व्यवहार वन्यजीवों के लिहाज से भी दिलचस्प है।

वैज्ञानिकों के लिए भी बना अध्ययन का विषय

रामनगर पीएनजीपीजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. एमसी पांडे के अनुसार, कछुए का लंबे समय तक लगभग निर्धारित समय पर मंदिर पहुंचना अध्ययन का विषय हो सकता है. केवल भोजन को इसके पीछे की वजह मान लेना पर्याप्त नहीं होगा. विशेषज्ञ कछुए की आवाजाही, उसके आने-जाने के रास्ते, आसपास मौजूद जलस्रोत और भोजन की उपलब्धता का अध्ययन करके उसके व्यवहार को समझ सकते हैं. इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि आखिर कछुआ बार-बार मंदिर तक क्यों पहुंचता है।

आस्था या प्राकृतिक व्यवहार, रहस्य बरकरार

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह के मुताबिक, मानसून के दौरान कछुए समेत कई सरीसृप अपने ठिकानों से बाहर निकलते हैं. मंदिर के आसपास जंगल और नदी-नालों की मौजूदगी को देखते हुए कछुए का इस क्षेत्र में आना स्वाभाविक हो सकता है. मंदिर में मिलने वाला भोजन भी उसे आकर्षित कर सकता है. फिलहाल कछुए का रोजाना मंदिर पहुंचना लोगों के लिए आस्था और कौतूहल दोनों का विषय बना हुआ है. इसके पीछे धार्मिक विश्वास है या भोजन की तलाश में विकसित हुआ प्राकृतिक व्यवहार, इसका स्पष्ट जवाब वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही सामने आ सकेगा।

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