HaridwarDoodhKiHoli ; 116 वर्षों की अटूट परंपरा है हरिद्वार में दूध की होली :- देवभूमि हरिद्वार के पावन तटों पर आस्था का एक ऐसा अलौकिक दृश्य देखने को मिला, जिसने हर श्रद्धालु का मन मोह लिया. मुल्तान समाज के लोगों ने पवित्र ब्रह्मकुंड में मां गंगा के साथ दूध की होली खेलकर पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया. यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि सौ से भी अधिक वर्षों से चली आ रही अगाध श्रद्धा, मन्नत और राष्ट्र-कल्याण की एक जीवंत परंपरा है।
इस पावन परंपरा की शुरुआत सन 1911 में हुई थी, जब पाकिस्तान के मुल्तान से व्यापारी लाला रूपचंद पैदल यात्रा कर हरिद्वार पहुंचे थे. लाला जी की दस संतानों में से कोई भी जीवित नहीं बच सकी थी. जब उनकी एक बेटी गंभीर रूप से घायल हुई, तो लाला जी ने अपनी अंतिम आस मां गंगा के चरणों में लगाई. एक साधक के सुझाव पर उन्होंने मुल्तान से पैदल चलकर हरिद्वार पहुंचकर गंगा मैया में जोत प्रवाहित करने का प्रण लिया. मां गंगा के आशीर्वाद से उनका दुःख दूर हुआ और बेटी की रक्षा हुई. वही जोत आज 116वें ‘मुल्तान जोत महोत्सव’ के रूप में जल रही है।
मुल्तान समाज के लोग मां गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि अपनी प्रत्यक्ष मां मानते हैं. इस विशेष अवसर पर ब्रह्मकुंड में मां गंगा का दुग्धाभिषेक किया गया और दूध की होली खेली गई. श्रद्धालुओं ने इस माध्यम से मां गंगा की स्वच्छता, निर्मलता और संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया. गंगा जल में दुग्ध धारा अर्पित कर देश की समृद्धि, आपसी मेल-जोल और विश्व शांति के लिए प्रार्थना की गई।
उमड़े श्रद्धालु, आपसी भाईचारे की मिसाल
देश के कोने-कोने से आए मुल्तान समाज के श्रद्धालुओं ने हर की पौड़ी को एक अलग ही दिव्य रंग में रंग दिया. स्थानीय और दूर-दराज़ से आए अन्य श्रद्धालुओं के लिए भी यह क्षण अद्भुत रहा. यह महोत्सव न केवल ऐतिहासिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज में एकता, प्रेम और परस्पर सद्भाव को मज़बूत करने वाली एक सुंदर मिसाल बनकर उभरता है।

