नन्हीं परी’ हत्याकांड में न्याय नहीं! सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उठे सवाल :- नमस्कार दोस्तों, 2014 उत्तराखंड का हल्द्वानी, एक सात साल की मासूम बच्ची, जिसे लोग नन्हीं परी कहकर बुलाते थे, अपने परिवार के साथ शादी में शामिल होने आई थी, लेकिन इस मासूम का जीवन यहीं थम गया, वो लापता हुई और पाँच दिन बाद उसका शव गौला नदी के किनारे जंगल में मिला, पोस्टमार्टम में खुलासा हुआ, पहले दुष्कर्म, फिर बर्बर हत्या, हाईकोर्ट से फांसी, सुप्रीम कोर्ट से बरी, इस वीभत्स घटना ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया, हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी अख्तर अली को फांसी की सजा सुनाई।
लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो 2024 में आए फैसले ने सबको हैरान कर दिया, सबूतों के अभाव में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया, यह फैसला जैसे न्याय की उम्मीद पर ताज़ा चोट थी, एक मां बाप की पुकार, एक समाज की आवाज़, जैसे अनसुनी कर दी गई हो, गुस्से की आग अब सडकों पर, हल्द्वानी, पिथौरागढ़ समेत पूरे प्रदेश में इस फैसले के खिलाफ आक्रोश फैल गया है।
18 सितंबर को बुद्ध पार्क, हल्द्वानी में हजारों लोग इकट्ठा हुए, सामाजिक संगठन, लोक कलाकार, आम जनता, लोगों ने हाथों में तख्तियाँ लेकर नारे लगाए, नन्हीं परी को न्याय दो, दोषी को फांसी दो, पुलिस ने रोका, लेकिन प्रदर्शनकारी सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय तक पहुँच गए, राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा गया, सिर्फ एक केस नहीं।
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ये भरोसे का सवाल है, लोग पूछ रहे हैं, जब इतनी बडी क्रूरता पर भी सजा नहीं मिलती, तो आम जनता किससे उम्मीद करे, हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश, लोक गायिका श्वेता महरा, प्रियंका मेहरा, इंदर आर्य जैसे कलाकार भी इस आंदोलन में शामिल हुए, यह सिर्फ एक बच्ची के लिए न्याय की लड़ाई नहीं।
बल्कि पूरे सिस्टम पर एक सवाल है, एक समाज की पुकार, हम खामोश नहीं रहेंगे, नन्हीं परी अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी चीख, उसकी तकलीफ, उसका न्याय आज भी हमारे ज़मीर को झकझोर रहा है, अगर अब भी हम चुप रहे, तो कल कोई और नन्हीं परी इसी सिस्टम की भेंट चढ़ जाएगी।

