BrainReadingAI : कैसे काम करती है Brain-Reading AI :- मेंटल हेल्थ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में एक ऐसा क्रांतिकारी बदलाव आया है जो आने वाले समय में लाखों जिंदगियां बचा सकता है. चीन के शेनजेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ‘ब्रेन-रीडिंग’ AI मॉडल डेवलप किया है जो किसी व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव पर मिलने वाले दिमागी रिस्पॉन्स को देखकर यह बता सकता है कि उसे आने वाले 4 सालों में डिप्रेशन होगा या नहीं. इतना ही नहीं, यह टेक्नोलॉजी, फ्यूचर में ऐसे ह्यूमनॉइड रोबोट्स बनाने में भी मदद करेगी जो इंसानों के चेहरे की बारीक एक्सप्रेशन्स (nuanced facial cues) को देखकर उनके दिल और दिमाग का हाल समझ सकेंगे।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 33 करोड़ 20 लाख लोग डिप्रेशन की बीमारी से जूझ रहे हैं. इनमें से एक-तिहाई लोग ऐसे हैं जिन पर पारंपरिक दवाओं का कोई असर नहीं होता, जिसे ट्रीटमेंट-रेसिस्टेंट डिप्रेशन कहा जाता है. अगर अकेले चीन की बात करें तो नेशनल बिजनेस डेली की रिपोर्ट के अनुसार वहां 9 करोड़ 5 लाख लोग इस गंभीर मानसिक समस्या का सामना कर रहे हैं।
इस बड़े खतरे से निपटने के लिए शेनजेन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की असिस्टेंट प्रोफेसर लू हान (Lu Han) की लीडरशिप में एक टीम ने यह अध्ययन किया है. उनका यह रिसर्च पेपर दुनिया की पॉपुलर मैगजीन ‘साइंस एडवांसेज’ (Science Advances) में पब्लिश हुआ है।
19 की उम्र में स्कैन और 23 में डिप्रेशन का पता
वैज्ञानिकों ने यूरोपीय देशों के कई टीनेजर्स के एक बड़े डेटासेट (IMAGEN cohort) का एनालिसिस किया. इस स्टडी में 19 साल की उम्र के युवाओं के दिमाग के fMRI स्कैन (Functional Magnetic Resonance Imaging) लिए गए. उस समय उनसे ‘इमोशनल-फेस टास्क’ कराया गया जिसमें उन्हें अलग-अलग चेहरे के हाव-भाव दिखाए गए।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने उनके खून के सैंपल से जेनेटिक डेटा इकट्ठा किया और प्रश्नावली से उनके मानसिक व्यवहार को मापा. जब ये युवा 23 साल के हुए, तब दोबारा उनका फॉलोअप लिया गया. AI मॉडल ने 19 साल की उम्र के दिमागी स्कैन को देखकर यह बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी कर दी थी कि 23 साल की उम्र में किन युवाओं में डिप्रेशन और एंग्जायटी के गंभीर लक्षण डेवलप होंगे।
चेहरे के हाव-भाव और नेगेटिव बायस का खेल
रिसर्चर लू हान के अनुसार, एक इंसान दूसरों के चेहरे के भावों में आ रहे बदलावों को बहुत आसानी से समझ लेता है और उसी हिसाब से रिएक्ट करता है. उदाहरण के लिए, जब कोई सामने से मुस्कुराता है तो सामान्य व्यक्ति भी दोस्ताना व्यवहार दिखाता है. लेकिन डिप्रेशन के खतरे से जूझ रहे लोगों के दिमाग में ऐसा नहीं होता।
डिप्रेशन के प्रति संवेदनशील लोग सामने वाले के हल्के भावों को भी ‘गुस्सा’ मान लेते हैं. वे हमेशा यह मान बैठते हैं कि सामने वाला इंसान उनसे नाराज है या उन्हें रिजेक्ट कर रहा है. मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘नेगेटिव इंफॉर्मेशन प्रोसेसिंग बायस’ (Negative Information Processing Bias) कहा जाता है. डिप्रेशन से पीड़ित लोग हमेशा नकारात्मक सामाजिक जानकारियों को ही ज्यादा याद रखते हैं और उसी पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

