गंगा किनारे बसे पिरान कलियर का इतिहास :- उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे बसा पिरान कलियर शरीफ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सूफी चाहने वालों के लिए एक बड़ा मरकज यानी धार्मिक केंद्र है. यहां हजरत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर कलियरी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह शरीफ है, जिन्हें लोग प्यार से साबिर पाक कहते हैं. पिरान कलियर शरीफ दरगाह में हर साल हजरत साबिर पाक का सालाना उर्स आयोजित किया जाता है. इस बार साबिर पाक का 757वां सालाना उर्स शुरू होने जा रहा है, जिसे उर्स मुबारक भी कहा जाता है. यह उर्स 5 सितंबर से 8 सितंबर 2025 तक होगा. हर साल की तरह रुड़की के पास कलियर शरीफ में आयोजित एक बड़ा आध्यात्मिक मेला होता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों लोग शामिल होते हैं।
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उर्स क्या होता है ?
इस्लाम और सूफी परंपरा में “उर्स” उस दिन को कहा जाता है जब कोई वली-ए-अल्लाह (सूफी संत) इस दुनिया से रुखसत हो जाता है. आसान शब्दों में कहें तो यह दिन उनकी “बरसी” की तरह मनाया जाता है, लेकिन गम के बजाय खुशी और मोहब्बत के साथ, क्योंकि सूफियों की नजर में यह असल मिलन का दिन होता है. इसे “सूफी मेला” भी कहा जाता है।
पिरान कलियर का उर्स कब लगता है?
साबिर पाक का सालाना उर्स इस्लामी कैलेंडर के रबी-उल-अव्वल महीने की 13, 14 और 15वीं तारीख को मनाया जाता है. इस दौरान यहां लाखों जायरीन भारत के अलग-अलग हिस्सों से ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अरब देशों से भी आते हैं. पिरान कलियर शरीफ के उर्स की शुरुआत झंडा फहराने और मेंहदी डोरी की रस्म से होती है, जिसके बाद चांद दिखाई देने पर उर्स का आगाज होता है।
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उर्स की खासियत
उर्स के मौके पर पूरी दरगाह शरीफ को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है. इस दौरान यहां कव्वालियां, नातें और सूफी कलाम पेश किए जाते हैं, जिनमें मोहब्बत, इंसानियत और अमन का पैगाम होता है. साथ ही, जायरीन दरगाह पर चादर, गुलाब के फूल और अगरबत्ती चढ़ाते हैं. इस दौरान दरगाह में लंगर का भी खास इंतजाम होता है, जिसमें हर धर्म के लोग एक साथ बैठकर खाना खाते हैं. इस उर्स में मेंहदी डोरी की रस्म और झंडा फहराने जैसी रस्में शामिल होती हैं।
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साबिर पाक की पहचान
साबिर पाक चिश्ती सिलसिले के बहुत बड़े सूफी संत थे. उनका पूरा जीवन फक्र (सादगी), सब्र और खिदमत-ए-खल्क (लोगों की सेवा) में गुजरा. यही वजह है कि उन्हें “साबिर पाक” कहा जाता है. उनके दरगाह पर आने वाला हर शख्स आज भी सुकून, राहत और दुआओं की कुबूलियत का एहसास करता है. पिरान कलियर का उर्स सिर्फ मुसलमानों का नहीं बल्कि हिंदू, सिख और दूसरे मजहब के लोग भी पूरी श्रद्धा से इसमें शामिल होते हैं. यह जगह गंगा-जमना तहजीब की सबसे बड़ी मिसाल है।

