PackagedFoodHazards ; चमकदार पैकेटों के चक्कर में खराब न करें बच्चे की सेहत :- सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्त टिप्पणी ने पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लगाने की राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है। बाजार अनुसंधान फर्म आइएमएआरसी के मुताबिक, भारत का पैकेज्ड फूड बाजार 137.25 अरब डॉलर ( लगभग 11.87 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया है। आज हर उपभोक्ता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि हम जो खा रहे हैं, क्या वाकई उसका सच जानते हैं ? विशेषकर तब, जब देश के 4 करोड़ से अधिक मोटे और अत्यधिक वजन वाले बच्चों को चतुर विज्ञापनों के जरिए सीधे निशाना बनाया जा रहा है। पैकेट पर छपी चेतावनी हमें केवल आगाह कर सकती है, लेकिन विवेकपूर्ण चयन का रास्ता पूरी तरह हमारे अपने हाथ में है।
जागती फूड चेतना
पिछले कुछ दशकों में हमारा भोजन बेहद जटिल हो चुका है। जो कभी सीधे खेतों से रसोई तक पहुंचने वाला शुद्ध आहार था, वह अब फैक्ट्रियों में तैयार होने वाला एक इंजीनियर उत्पाद बन चुका है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल बीमारियों के बोझ का 56.4 प्रतिशत हिस्सा अस्वास्थ्यकर आहार और खराब जीवनशैली से जुड़ा हुआ है।
असल में स्वास्थ्य केवल कैलोरी गिनना नहीं, बल्कि भोजन, गति, विश्राम और प्रकृति के बीच का संतुलन है। भोजन केवल पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर की आंतरिक बुद्धिमत्ता को पोषण देने वाली जानकारी है। इसलिए हमें केवल लेबलिंग से आगे बढ़कर फूड कांशियसनेस यानी भोजन के प्रति चेतना को जगाना होगा।
अक्सर पैकेट के सामने का हिस्सा ‘नेचुरल’, ‘मल्टीग्रेन’, ‘हाई फाइबर’ और ‘बेक्ड’ जैसे भ्रामक शब्दों से हमें रिझाता है। सामने के इस चटक रंग के छलावे में मत आइए, पैकेट को उलटकर पीछे लिखी सामग्री और पोषण तालिका को बारीकी से पढ़िए। यह जांचिए कि उसमें सबसे प्राथमिक चीजें क्या हैं? वहां शुगर सिर्फ चीनी के नाम से नहीं, बल्कि ग्लूकोज सिरप, फ्रक्टोज, डेक्सट्रोज, इन्वर्ट सिरप और माल्टोडेक्सट्रिन जैसे दर्जनों छद्म नामों के पीछे छिपी होती है। ठीक इसी तरह नमक भी सोडियम के अलग-अलग रूपों में मौजूद रहता है।
आधुनिक फूड टेक्नोलॉजी हमारी आंखों, नाक और जीभ को मूर्ख बनाने में माहिर हो चुकी है। प्राकृतिक भोजन का अपना रंग और स्वाभाविक स्वाद होता है, लेकिन फैक्ट्रियों में कृत्रिम रंग, प्रिजर्वेटिव्स और स्टेबलाइजर्स का ऐसा घातक कांबिनेशन मिलाया जाता है जो प्रकृति के मूल स्वरूप को नष्ट कर देता है।
चिंता की बात तब होती है जब हमारे बच्चों का नाश्ता, स्कूल का टिफिन, शाम की भूख और डेजर्ट पूरी तरह पैकेटों पर निर्भर हो जाते हैं, जिससे हमारी डाइट का ढांचा ही बिगड़ जाता है।अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन की जीत ही यही है कि पेट भरने के बाद भी कृत्रिम स्वाद के कारण हम इसे खाते चले जाते हैं। हमें अपनी और अपने बच्चों की जीभ को दोबारा ट्रेन करना होगा। बच्चों को फलों और सब्जियों की प्राकृतिक मिठास का अनुभव लेने दें।

