DoonClub : दून क्लब : एक ऐतिहासिक धरोहर का सफ़रनामा :- क्या आप जानते हैं देहरादून का दून क्लब केवल एक प्रतिष्ठित क्लब नहीं, बल्कि 148 वर्षों की ऐतिहासिक विरासत का जीवंत साक्षी है ? यह वही संस्था है जिसने ब्रिटिश शासन से लेकर स्वतंत्र भारत तक का संक्रमण देखा और औपनिवेशिक पहचान को भारतीय अस्मिता में बदलते हुए इतिहास रचा। देहरादून कभी केवल एक शहर नहीं था, वह एक जीवंत सांस्कृतिक संसार था।
हिमालय की तलहटी में बसा यह नगर अपनी शांत सड़कों, चौड़ी राजपुर रोड, विशाल वृक्षों, औपनिवेशिक स्थापत्य, अंग्रेज़ी शैली के बंगलों, चाय-बागानों, सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय सैन्य अकादमी, वन अनुसंधान संस्थान और देश-विदेश से आए विद्वानों, सैनिकों तथा प्रशासकों के कारण अपनी अलग पहचान रखता था। उस दौर का देहरादून भारत के सबसे सुसंस्कृत, अनुशासित और सुरुचिपूर्ण शहरों में गिना जाता था। यहाँ शामें केवल ढलती नहीं थीं, बल्कि इतिहास, साहित्य, संगीत और सामाजिक संवाद की नई कहानियाँ रचती थीं। इसी ऐतिहासिक देहरादून की पहचान का एक महत्वपूर्ण अध्याय है—दून क्लब।
दून क्लब की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में उस समय हुई, जब देहरादून उत्तर भारत में अंग्रेज अधिकारियों, सैन्य अधिकारियों और सर्वे ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों का प्रमुख केंद्र था। प्रारंभिक वर्षों में यह क्लब राजपुर रोड स्थित वर्तमान सेंट जोसेफ अकादमी परिसर के उस भवन में संचालित होता था, जो कभी कर्नल यंग (Colonel Young) का बंगला हुआ करता था। वर्ष 1878 से दून क्लब की गतिविधियाँ यहीं प्रारंभ हुईं।
समय के साथ क्लब की लोकप्रियता और गतिविधियाँ बढ़ीं। परिणामस्वरूप वर्ष 1903-04 के आसपास इसे परेड ग्राउंड के समीप न्यू सर्वे रोड स्थित वर्तमान परिसर में स्थानांतरित कर दिया गया। 15 मार्च 1903 को लगभग 18,200 रुपये में इस भवन की विधिवत रजिस्ट्री हुई, जो उस समय एक अत्यंत बड़ी धनराशि मानी जाती थी। यह केवल एक भवन का क्रय नहीं था, बल्कि देहरादून के सामाजिक इतिहास के एक नए अध्याय का प्रारंभ था।
ब्रिटिश काल में दून क्लब केवल मनोरंजन का स्थान नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक समाज का प्रतिष्ठित सामाजिक केंद्र था। यहाँ अंग्रेज अधिकारी, सेना के वरिष्ठ अधिकारी, सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक, वन अधिकारी और उच्च प्रशासनिक वर्ग एकत्र होते थे। शाम के समय यहाँ पश्चिमी संगीत की धुनें गूँजती थीं, औपचारिक रात्रिभोज आयोजित होते थे, टेनिस, बिलियर्ड्स, बैडमिंटन और अन्य खेल खेले जाते थे तथा साहित्य, प्रशासन और साम्राज्य की नीतियों पर चर्चा होती थी। क्लब की दीवारों पर आज भी उस युग की अनेक ऐतिहासिक स्मृतियाँ और सर्वे ऑफ इंडिया से जुड़ी विरासतें दिखाई देती हैं।
समय बदला वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और अंग्रेज भारत छोड़कर जाने लगे। उस समय ब्रिटिश अधिकारियों ने यह निर्णय लिया कि दून क्लब को भी बंद कर दिया जाए। उनका मानना था कि भारत छोड़ते समय वे अपनी इस औपनिवेशिक संस्था को समाप्त कर दें ताकि ब्रिटिश शासन की कोई विशेष निशानी यहाँ शेष न रहे।किन्तु इतिहास हमेशा सत्ता की इच्छा से नहीं लिखा जाता; कई बार कुछ व्यक्तियों का साहस उसे नई दिशा देता है। दून क्लब के इतिहास में ऐसा ही एक नाम है—कर्नल कुंवर शमशेर बहादुर सिंह। उन्होंने इस निर्णय का दृढ़ता से विरोध किया। उनका विश्वास था कि दून क्लब केवल अंग्रेजों की स्मृति नहीं, बल्कि देहरादून की सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर है। यदि इसे समाप्त कर दिया गया तो आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय से वंचित हो जाएँगी।
कर्नल शमशेर बहादुर सिंह ने इस उद्देश्य के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। तत्कालीन जिलाधिकारी बी. डी. सनवाल ने भी उनका सहयोग किया। यह संघर्ष स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा; मामला इलाहाबाद तक पहुँचा और अंततः भारतीय पक्ष की विजय हुई। इस ऐतिहासिक सफलता ने दून क्लब को समाप्त होने से बचा लिया।यह केवल एक संस्था को बचाने की जीत नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक विरासत को भारतीय स्वामित्व और भारतीय आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ाने की विजय थी।इसी संघर्ष का परिणाम था कि वर्ष 1950 में कर्नल कुंवर शमशेर बहादुर सिंह दून क्लब के प्रथम भारतीय अध्यक्ष बने। यह घटना केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र भारत के आत्मविश्वास और स्वाभिमान का प्रतीक थी।
आज दून क्लब देश-विदेश के लगभग ढाई हजार सदस्यों वाला प्रतिष्ठित संस्थान है। इसकी सदस्यता आज भी सम्मान और गरिमा का विषय मानी जाती है। सेना के वरिष्ठ अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, उद्योगपति, शिक्षाविद और समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोग इससे जुड़े रहे हैं। जून 2026 में क्लब का 125 वाँ चुनाव संपन्न हुआ, जो इसकी निरंतर लोकतांत्रिक परंपरा का प्रमाण है।

