AirportTerminal : एयरपोर्ट पर क्यों होते हैं टर्मिनल :- आमतौर पर जब हम एयरपोर्ट पर जाते हैं तब सबसे पहले टर्मिनल में ही एंट्री करते हैं. मगर कभी दिमाग में सवाल आया है कि एयरपोर्ट पर ये टर्मिनल क्यों होते हैं? आज आपको इससे जुड़े सभी सवालों का जवाब आसान भाषा में मिलने वाला है. दरअसल टर्मिनल वो बड़ी इमारत होती है जहां से यात्रियों का पूरा सफर शुरू होता और खत्म भी यही आकर होता है. यहीं टिकट चेक होती है, सामान जमा किया जाता है, सुरक्षा जांच होती है और यहीं से यात्री विमान तक पहुंचते हैं. फ्लाइट से उतरने के बाद भी यात्री सबसे पहले टर्मिनल में ही आते हैं. यानी ये एयरपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है।
एयरपोर्ट पर क्यों होते हैं एक से ज्यादा टर्मिनल
अगर किसी एयरपोर्ट पर यात्रियों की संख्या अधिक होती है. यानी एयरपोर्ट खासा बिजी रहता है, तब वहां एक से ज्यादा टर्मिनल बनाए जाते हैं. अधिक टर्मिनल की वजह से यात्रियों की भीड़ को संभालना आसान हो जाता है. जैसे अलग-अलग टर्मिनल होने से चेक-इन, सिक्योरिटी और बोर्डिंग का काम तेजी से होता है. कई बार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अलग टर्मिनल बनाए जाते हैं. इससे यात्रियों को सुविधा मिलती है और एयरपोर्ट पर व्यवस्था भी बेहतर बनी रहती है।
टर्मिनल में क्या-क्या होता है?
टर्मिनल सिर्फ इंतजार करने की जगह नहीं होता. इसके अंदर एयरलाइन के चेक-इन काउंटर, बैगेज ड्रॉप, सुरक्षा जांच, इमिग्रेशन, कस्टम, बोर्डिंग गेट, बैगेज बेल्ट, लाउंज, रेस्टोरेंट, कैफे, शॉपिंग स्टोर, मेडिकल सुविधा और कई जरूरी सेवाएं होती हैं. बड़े एयरपोर्ट के टर्मिनल किसी छोटे शहर की तरह लगते हैं, जहां यात्रियों की हर जरूरत का ध्यान रखा जाता है।
इसी वजह से लोग फ्लाइट से काफी पहले एयरपोर्ट पहुंचने की सलाह देते हैं.डोमेस्टिक यानी घरेलू टर्मिनल से देश के अंदर जाने वाली उड़ानें संचालित होती हैं. वहीं इंटरनेशनल टर्मिनल से दूसरे देशों की फ्लाइट उड़ान भरती हैं. अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को पासपोर्ट जांच, वीजा सत्यापन, इमिग्रेशन और कस्टम जैसी एडिशनल प्रोसीजर से गुजरना पड़ता है. इसलिए इंटरनेशनल टर्मिनल में ज्यादा सुरक्षा और अलग सुविधाएं होती हैं. हालांकि कुछ आधुनिक एयरपोर्ट पर एक ही टर्मिनल से दोनों तरह की उड़ानें भी संचालित की जाती हैं।
कैसे तय होता है टर्मिलन का नंबर
आपने अक्सर टर्मिनल 1, टर्मिनल 2 या टर्मिनल 3 जैसे नाम सुने होंगे. इन नंबरों का कोई खास वैज्ञानिक मतलब नहीं होता है. आमतौर पर जब एयरपोर्ट का विस्तार होता है और नई बिल्टिंग बनाई जाती हैं तो उसे नया नंबर दे दिया जाता है. कई बार सबसे पुराना टर्मिनल T1 कहलाता है और उसके बाद बनने वाले T2, T3 या T4. कुछ एयरपोर्ट पर अलग एयरलाइंस या खास तरह की उड़ानों के लिए भी अलग टर्मिनल तय किए जाते हैं।
दरअसल हर फ्लाइट का अपना तय टर्मिनल होता है और उसी के हिसाब से उड़ान का टाइम तय किया जाता है. ऐसे में अगर यात्री गलत टर्मिनल पर पहुंच जाए तो उसे काफी परेशान हो सकती है. फ्लाइट छूटने तक का खतरा हो सकता है।

