UttarakhandMilletsCrisis : उत्तराखंड के मंडुवा-झंगोरा पर संकट के बादल :- सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर अक्सर चौंकाने वाला होता है। एक तरफ जहां केंद्र और राज्य सरकारें ‘श्रीअन्न’ (मिलेट्स) को पोषण और पर्यावरण के अनुकूल मानकर इसके प्रचार-प्रसार में जुटी हैं, वहीं उत्तराखंड के पहाड़ों से आई एक ताजा रिपोर्ट ने नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।
पलायन निवारण आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में राज्य के पारंपरिक और पोषक अनाजों मंडुवा और झंगोराके रकबे में भारी गिरावट आई है। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016-17 से 2021-22 के बीच उत्तराखंड में मंडुवे और झंगोरे की खेती के क्षेत्र में 27-27 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई है।
मंडुवा: वर्ष 2016-17 में इसका रकबा 1,06,385 हेक्टेयर था, जो 2021-22 में सिमटकर 77,927 हेक्टेयर रह गया। यानी पांच वर्षों में 28,438 हेक्टेयर भूमि पर मंडुवे की खेती पूरी तरह बंद हो गई।
झंगोरा: इन पांच वर्षों में इसका क्षेत्र भी 51,410 हेक्टेयर से घटकर 37,594 हेक्टेयर रह गया है।
जिलावार स्थिति
पहाड़ी जिलों में पौड़ी और अल्मोड़ा में सबसे ज्यादा नुकसान देखा गया है, जबकि मैदानी जिलों या कुछ सीमित इलाकों में आंशिक सुधार है। जिलों में आया यह बदलाव (हेक्टेयर में) इस प्रकार है:
पौड़ी: मंडुवा (-9,801) | झंगोरा (-6,264)
अल्मोड़ा: मंडुवा (-9,108) | झंगोरा (-2,876)
टिहरी: मंडुवा (-4,166) | झंगोरा (-4,096)
चंपावत: मंडुवा (-1,857) | झंगोरा (-168)
नैनीताल: मंडुवा (-945) | झंगोरा (-353)
पिथौरागढ़: मंडुवा (-843) | झंगोरा (-397)
बागेश्वर: मंडुवा (-672) | झंगोरा (-202)
रुद्रप्रयाग: मंडुवा (-625) | झंगोरा (+507)
देहरादून: मंडुवा (-487) | झंगोरा (-125)
उत्तरकाशी: मंडुवा (+58) | झंगोरा (+122)
चमोली: मंडुवा (+04) | झंगोरा (+36)
ऊधम सिंह नगर: मंडुवा (+04) | झंगोरा (00)
इस संकट की वजह क्या है?
पलायन निवारण आयोग के उपाध्यक्ष डॉक्टर एसएस नेगी और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के विज्ञानी डॉ. वीरेंद्र सिंह व डॉ. श्याम मणि त्रिपाठी के शोध इस गिरावट के पीछे कई मुख्य कारणों को रेखांकित करते हैं:
पलायन और श्रम की कमी: गांवों से लगातार हो रहे पलायन के कारण खेतों में काम करने वाले श्रमिकों की भारी कमी हो गई है, जिससे खेती की लागत (लेबर कॉस्ट) लगातार बढ़ रही है।
वन्यजीवों का आतंक: जंगली जानवरों द्वारा फसलों को पहुंचाई जाने वाली क्षति से तंग आकर किसान खेती छोड़ रहे हैं।
मौसम और सिंचाई: सिंचाई सुविधाओं का अभाव और मौसम का बदलता मिजाज खेती को और जोखिमभरा बना रहा है।
कमजोर बाजार तंत्र: उचित मूल्य न मिलना और मशीनीकरण का अभाव किसानों को इस पोषक फसल से दूर कर रहा है, जिससे कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो रही है।
इस संकट से निपटने और राज्य की आर्थिकी को बचाने के लिए कृषि विभाग ने कमर कस ली है। कृषि विभाग के निदेशक दिनेश कुमार के अनुसार, सरकार ने नई मिलेट नीति लागू की है। अगले 10 वर्षों में मिलेट फसलों का रकबा 70 हजार हेक्टेयर बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए बंजर और परती पड़ी भूमि को दोबारा उपयोग में लाया जाएगा और वहां मिलेट फसलें उगाने के लिए विशेष प्रयास शुरू कर दिए गए हैं।

