RajaSagarStory : महाराज सगर के 60,000 बेटों को भस्म करने का रहस्य :- रामायण के बालकांड के 38वें सर्ग में राजा सगर की एक बेहद दिलचस्प और पौराणिक कथा मिलती है. इस कथा को महर्षि विश्वामित्र ने स्वयं भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को सुनाया था. कथा के मुताबिक सूर्यवंश के राजा बाहुक अपनी गर्भवती पत्नी यादवी के साथ दुश्मनों के डर से जंगलों में भटक रहे थे. सौतेली मां के दिए जहर के कारण उनका प्रसव सात साल तक रुका रहा. राजा बाहुक की मृत्यु के बाद महर्षि और्व के आश्रम में बालक का जन्म हुआ. जहर के साथ पैदा होने के कारण ही महर्षि ने इस प्रतापी बालक का नाम सगर रखा था.
100 वर्षों की कड़ी तपस्या
बड़े होकर राजा सगर ने अपना खोया हुआ राज्य वापस पाया, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी. उन्होंने अपनी दो पत्नियों, केशिनी और सुमति के साथ हिमालय पर 100 वर्षों तक कड़ी तपस्या की. उनकी तपस्या से खुश होकर महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया. वरदान के चलते रानी केशिनी ने असमंजस नाम के एक पुत्र को जन्म दिया, जो बाद में बहुत उद्दंड निकला. वहीं दूसरी रानी सुमति को एक पिंड से 60,000 पुत्र प्राप्त हुए. राजा सगर ने आगे चलकर एक भव्य अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उनके नेक पोते अंशुमान को सौंपी गई।
इंद्र ने चुरा लिया था घोड़ा
यज्ञ के दौरान देवराज इंद्र ने रूप बदलकर यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया. राजा सगर ने अपने 60,000 पुत्रों को घोड़े की खोज में भेजा. राजकुमारों ने घोड़े को ढूंढने के लिए पूरी पृथ्वी को खोद डाला, जिससे कई जीवों की जान चली गई. आखिरकार उत्तर पूर्वी दिशा में उन्हें भगवान कपिल के आश्रम के पास वह घोड़ा चरता हुआ मिल गया. अज्ञानता के कारण सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि को ही चोर समझकर उन पर हमला कर दिया. इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने अपनी एक ही दिव्य दृष्टि से उन सभी 60,000 राजकुमारों को तुरंत भस्म कर दिया।
चाचाओं की राख का ढेर
काफी देर होने पर राजा सगर ने अपने पोते अंशुमान को उनकी तलाश में भेजा. अंशुमान को रास्ते में चार दिशाओं के महान हाथी मिले, जिन्होंने उन्हें सही रास्ता दिखाया. आश्रम पहुंचकर अंशुमान को अपने चाचाओं की राख का ढेर और यज्ञ का घोड़ा मिला. वहां पक्षीराज गरुड़ ने अंशुमान को बताया कि इन सबकी मुक्ति केवल स्वर्ग की अलौकिक गंगा नदी के जल से ही संभव है. राजा सगर घोड़ा वापस लाकर अपना यज्ञ तो पूरा कर पाए, लेकिन वे गंगा जी को धरती पर नहीं ला सके. उनके बाद अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप ने भी हजारों वर्षों तक इसके लिए घोर तपस्या की, लेकिन वे भी सफल नहीं हो पाए।
1,000 वर्षों तक कठिन तपस्या
अंत में दिलीप के पुत्र भगीरथ ने हार नहीं मानी और गोकर्ण में जाकर 1,000 वर्षों तक कठिन तपस्या की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दे दी. इसके बाद गंगा के तेज वेग को संभालने के लिए भगीरथ ने भगवान शिव को प्रसन्न किया. इस प्रकार सगर वंश की चार पीढ़ियों के लंबे संघर्ष और भगीरथ के कठिन त्याग के बाद माता गंगा का धरती पर आगमन हुआ. इस पूरी पौराणिक कथा का दूसरा रूप जैन ग्रंथों में भी मिलता है. वहां राजा सगर को दूसरे तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का छोटा भाई और एक महान चक्रवर्ती सम्राट बताया गया है।

