Vairalmythology : वैकुंठ के द्वारपाल कैसे बन गए खूंखार राक्षस ? :- शास्त्रों और पुराणों में कई रहस्यमयी कहानियां मिलती हैं. भगवान विष्णु के दो द्वारपालों जय और विजय की कहानी भी बड़ी रहस्यमयी है. ये दोनों भगवान के सबसे भरोसेमंद सेवक थे. दोनों हमेशा वैकुंठ के द्वार पर खड़े रहकर भगवान की सेवा किया करते थे, लेकिन एक दिन ऐसा कुछ हुआ, जिससे इन दोनों का पूरा जीवन बदल गया. इन दोनों की एक छोटी सी भूल के कारण इनको श्राप मिला, जिसकी वजह ये धरती पर राक्षस बनकर जन्मे. आइए जय और विजय की ये रहस्यमयी और रोचक कथा जानते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार नाम के महान ऋषि भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुंठ धाम गए. उस समय जय और विजय द्वार पर थे. दोनों ने ऋषियों को भीतर जाने से रोका. ऋषियों को ये बात पसंद नहीं आई. उन्हें लगा कि जय और विजय अपने पद के घमंड में चूर हो गए हैं इस पर गुस्से में आकर उन्होंने दोनों को श्राप दे दिया।
ऋषियों ने उन्हें स्वर्ग छोड़कर मृत्यु लोक में जन्म लेने का श्राप दिया. श्राप सुनकर जय और विजय डर गए. वो भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे. भगवान ने उनको बताया कि ऋषियों से मिला हुआ श्राप टल नहीं सकता, लेकिन भगवान ने अपने द्वारपालों को दो रास्ते बताए. पहला ये कि दोनों सात जन्मों तक धरती पर रहकर भगवान की भक्ती करें. दूसरा ये कि तीन जन्मों में भगवान के शत्रु बने और उनके हाथों से मुक्ति पाकर वैकुंठ धाम लौट आएं।
जय और विजय ने जल्दी भगवान के पास लौटने के लिए दूसरे रास्ते का चुनाव किया. फिर दोनों ने राक्षस योनि में जन्म लिया. पहले जन्म में दोनों हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप बनकर जन्मे. उस समय भगवान विष्णु ने वराह और नरसिंह अवतार में दोनों का वध किया. दूसरे जन्म में जय और विजय रावण व कुंभकर्ण बने. तब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में दोनों का अंत किया. तीसरे जन्म में दोनों शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे. तब भगवान कृष्ण ने उनका वध किया. इस तरह से तीन जन्म लेकर जय और विजय ऋषियों के श्राप से मुक्त हो गए।

