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khojinarad HIndi News > उत्तराखण्ड > अल्मोड़ा > शेर दिल शिकारी जिम कार्बेट कैसे बने उत्तराखंड की पहचान ?
उत्तराखण्ड

शेर दिल शिकारी जिम कार्बेट कैसे बने उत्तराखंड की पहचान ?

कैसे जिम कार्बेट बने उत्तराखंड की शान और भारत के सबसे बड़े वन संरक्षक?

admin
Last updated: 2024/10/29 at 5:51 AM
admin
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4 Min Read
जिम कार्बेट कैसे बने उत्तराखंड की पहचान
जिम कार्बेट कैसे बने उत्तराखंड की पहचान
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Highlights
  • "शेर शिकारी से बने वन रक्षक जिम कार्बेट"
  • "उत्तराखंड की पहचान: जिम कार्बेट"
  • शेर शिकारी से बने वन रक्षक जिम कार्बेट.

 जिम कार्बेट कैसे बने उत्तराखंड की पहचान : क्या आप जानते हैं दुनिया के सबसे जांबाज़ और मशहूर शिकारी का रिश्ता उत्तराखंड से है। जी हाँ सही समझ रहे हैं आप , हम बात कर रहे हैं एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट यानी कार्पेट साहेब यानी जिम कॉर्बेट की … लेकिन आज की नई पीढ़ी को शायद उनके बारे में ज्यादा जानकारी न हो तो चलिए खोजी नारद की खोजी रिपोर्ट में हम आज उन्हीं शख्सियत से जुडी रोचक कहानी को जानते हैं।

Contents
33 आदमखोर बाघ और तेंदुए को किया ढेरउत्तराखंड के नैनीताल में हुआ था जिम कॉर्बेट का जन्म –

33 आदमखोर बाघ और तेंदुए को किया ढेर

जिम कॉर्बेट एक शिकारी और महान व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे. उन्होंने साल 1907 से साल 1938 के बीच कुमाऊं और गढ़वाल दोनों जगह नरभक्षी बाघों व तेंदुओं के आतंक से निजात दिलाई थी. हालांकि इसके अलावा जिम कॉर्बेट ने 6 किताबें भी लिखी हैं. इनमें से कई पुस्तकें पाठकों को काफी पसंद आईं, जो आगे चलकर काफी लोकप्रिय हुईं।

उत्तराखंड के नैनीताल में हुआ था जिम कॉर्बेट का जन्म –

मशहूर शिकारी एडवर्ड जेम्स जिम कॉर्बेट का जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था. नैनीताल में जन्मे होने के कारण जिम कॉर्बेट को नैनीताल और उसके आसपास के क्षेत्रों से बेहद लगाव था. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल में ही पूरी की. हालांकि अपनी युवावस्था में जिम कॉर्बेट ने पश्चिम बंगाल में रेलवे में नौकरी कर ली, लेकिन नैनीताल का प्रेम उन्हें नैनीताल की हसीन वादियों में फिर खींच लाया जहाँ कालाढूंगी में घर बनाया था ।

जिम कॉर्बेट ने साल 1915 में स्थानीय व्यक्ति से कालाढूंगी क्षेत्र के छोटी हल्द्वानी में जमीन खरीदी. सर्दियों में यहां रहने के लिए जिम कॉर्बेट ने एक घर बना लिया और 1922 में यहां रहना शुरू कर दिया. लेकिन गर्मियों में वो नैनीताल में गर्मी हाउस में रहने के लिए चले जाया करते थे. उन्होंने अपने सहयोगियों के लिए अपनी 221 एकड़ जमीन को खेती और रहने के लिए दे दिया. जिसे आज कॉर्बेट का गांव छोटी हल्द्वानी के नाम से जाना जाता है. उस दौर में छोटी हल्द्वानी में चौपाल लगा करती थी।

अगर आप अब जिम कॉर्बेट की अमूल्य धरोहर को देखना चाहते हैं तो समृद्ध संग्रहालय आपका स्वागत करता है। हजारों की तादाद में देश-विदेश से सैलानी जिम कॉर्बेट से जुड़ी यादों को देखने के लिए यहाँ आते हैं ….. हृदय परिवर्तन होने के कारण जिम कॉर्बेट ने बाघों के संरक्षण के लिए काम करना शुरू कर दिया….  हालांकि उसके बाद जिम कॉर्बेट ने कभी बाघ या अन्य जानवरों को मारने के लिए बंदूक नहीं उठाई.  उनके सम्मान में भारत सरकार ने साल 1955 में राष्ट्रीय उद्यान रामगंगा नेशनल पार्क का नाम बदलकर कॉर्बेट नेशनल पार्क रख दिया. जिम कॉर्बेट एक महान शिकारी थे. उनको तत्कालीन अंग्रेज सरकार आदमखोर बाघ को मारने के लिए बुलाती थी. गढ़वाल और कुमाऊं में उस वक्त आदमखोर बाघ और गुलदार ने आतंक मचा रखा था. कहा जाता है कि जिम कॉर्बेट ने 31 साल में 19 आदमखोर बाघ और 14 आदमखोर तेंदुए को ढेर किया था.न आज देश दुनिया के सैलानी उसी शेर दिल शिकारी की निशानियां देखने उत्तराखंड का रुख करते हैं।

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admin October 29, 2024 October 29, 2024
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