SupremeCourtIndia : फर्जी FIR से मिलेगी राहत ? जानिए सुप्रीम कोर्ट के नियम :- FIR दर्ज होने से ही, आरोपी को दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जांच के दौरान आरोपों की सत्यता अलग-अलग साक्ष्यों से परखी जाती है। लेकिन यदि FIR को उसके मूल रूप में पढ़ने पर भी कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता या पूरी कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग दिखाई देती है, तो कानून से मिले उपाय के तहत हाईकोर्ट अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 528 हाईकोर्ट को ऐसी आवश्यक कार्यवाही करने की शक्ति देती है जो न्याय के उद्देश्य पूरे करने या अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए जरूरी हो।
हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां और BNSS की धारा 528
इसे ऐसे भी जान सकते हैं कि फर्जी FIR रद्द कराने के लिए कौन सी धारा लागू होती है। ऐसे मामलों में दरअसल भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 528 हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां के बारे में बताती है। इसका उद्देश्य अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना और न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करना है। पुरानी CrPC में इसी तरह की शक्ति धारा 482 में थी और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि BNSS धारा 528 उसी प्रकृति की शक्ति है।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एफआईआर रद्द की कार्यवाही में सामान्यतः अदालत को सबूतों की विश्वसनीयता पर विस्तृत जांच करके मिनि ट्रायल नहीं करना चाहिए। याचिका में केवल FIR फर्जी है लिखने के बजाय ऐसे ठोस कानूनी आधार और दस्तावेज रखने महत्वपूर्ण होते हैं जो आरोपों की कानूनी कमी दिखाते हों।
याचिका में केवल FIR फर्जी है लिखने से नहीं चलेगा काम
सुप्रीम कोर्ट की गाईडलाइन क्या है
सुप्रीम कोर्ट के State of Haryana v. Bhajan Lal फैसले में ऐसी सात परिस्थितियों के उदाहरण दिए गए हैं जिनमें हाईकोर्ट अंतर्निहित शक्तियां का इस्तेमाल कर सकता है। इनमें FIR के आरोपों से प्रथम दृष्टया कोई अपराध न बनना, संज्ञेय अपराध का खुलासा न होना और आरोपों का इतना असंभव या बेतुका होना शामिल है कि उनके आधार पर आगे कार्यवाही का पर्याप्त आधार न हो। कानून में स्पष्ट रोक होने या कार्यवाही के दुर्भावनापूर्ण तरीके से निजी बदले के लिए शुरू किए जाने जैसी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
FIR में जरूरी तथ्य या अपराध के तत्व हैं या नहीं , देखना जरूरी
यदि FIR में लगाए गए आरोपों को सही मानकर भी संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते, तो यह रद्द का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के एक फैसले में भी दोहराया कि FIR कोई पूरी केस डायरी नहीं होती, लेकिन उसमें कथित संज्ञेय अपराध से जुड़े बुनियादी तथ्य और आरोप होने चाहिए।
अत्यधिक अस्पष्ट आरोपों या आवश्यक particulars के अभाव की स्थिति में हाईकोर्ट धारा 528 BNSS के तहत मामले की जांच कर सकता है।
हालांकि यह जांच इस सीमा तक होती है कि आरोप कानूनी तौर पर अपराध का प्रथम दृष्टया गठन करते हैं या नहीं, न कि पूरा मुकदमा ट्रायल की तरह चलाया जाए।

