RashtrapatiBhavan : भारत का राष्ट्रपति भवन दुनिया में क्यों है खास ? :- देश की राजधानी दिल्ली में स्थित राष्ट्रपति भवन देखने में बेहद सुंदर और भव्य नजर आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रपति भवन के अंदर कौन सी ऐसी खूबियां हैं जो इसे अलग बनाती हैं. राष्ट्रपति भवन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्रपति का निवास स्थान होता है. पहले ये ब्रिटिश वायसराय का सरकारी आवास हुआ करता था. इस खबर में आज हम बात करेंगे कि आखिर दिल्ली में स्थित राष्ट्रपति भवन को बनने में कितना समय लगा था और इसमें कितना खर्च आया था।
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मिली जानकारी के अनुसार, इसका निर्माण उस समय हुआ था जब साल 1911 में ये फैसला लिया गया गया था कि भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट किया जाए. बता दें कि इसका निर्माण 1912 में शुरू हुआ और 1929 में पूरा हुआ था. इस भवन के निर्माण में पूरे 17 साल लगे थे. जबकि लक्ष्य 4 साल का था।
राष्ट्रपति भवन की पहचान है सेंट्रल डोम
राष्ट्रपति भवन की सबसे बड़ी पहचान सेंट्रल डोम है. ये ऐतिहासिक सांची स्तूप की याद दिलाता है. ये गुंबद फोर कोर्ट के 55 फुट ऊपर भवन के मुकुट की तरह विराजमान है।
मार्बल हॉल में मौजूद है चांदी का सिंहासन
राष्ट्रपति भवन के मार्बल हॉल में किंग जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी की प्रतिमाएं लगी हुई हैं. पूर्व वायसरायों और पूर्व गवर्नरों की फोटोज भी लगी हुई हैं. वहीं, इसी हॉल में महारानी द्वारा इस्तेमाल किया गया चांदी का सिंहासन भी मौजूद है. ब्रिटिश राजमुकुट की पीतल की प्रतिकृति भी यहां रखी हुई हैं ।
राष्ट्रपति भवन में है गणतंत्र मंडप
बता दें कि राष्ट्रपति भवन के अंदर एक दरबार हॉल- पुराना नाम, नया नाम-गणतंत्र मंडप भी मौजूद है. इस हॉल में 33 मीटर की ऊंचाई पर 2 टन का एक झूमर लगा हुआ है. वहीं, अंग्रेजों के शासन काल में दरबार हॉल को सिंहासन कक्ष कहा जाता था. पहले के समय में इसमें दो सिंहासन वायसराय और वायसरीन के लिए होते थे. हालांकि अब इसमें सिर्फ एक ही कुर्सी मौजूद है, जो राष्ट्रपति के लिए होती है।
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राष्ट्रपति भवन के खंभों में बनी है घंटियों की डिजाइन
राष्ट्रपति भवन में खंभों में घंटियों की डिजाइन बनी हुई है. इन्हें डेली ऑर्डर भी कहा जाता है. अंग्रेज ऐसा मानते थे कि अगर घंटियां स्थिर रहें तो सत्ता स्थिर और लंबे वक्त तक चलेगी. इसलिए इन घंटियों को यहां बड़ी संख्या में बनाया गया था, लेकिन यह भवन बनते ही अंग्रेजों की सत्ता स्थिर नहीं थी।
क्यों रायसीना की पहाड़ी पर बना राष्ट्रपति भवन?
मिली जानकारी के अनुसार, एडविन लुटियंस और उनकी टीम ने पहले पूरी दिल्ली का मुआयना किया था. जिसके बाद उन्हें पता चला कि अगर दिल्ली के उत्तरी इलाके में वायसराय हाउस बनाया जाए, तो वहां हमेशा बाढ़ का खतरा रहेगा. क्योंकि वो इलाका यमुना से सटा था. इसलिए उन्होंने दक्षिणी हिस्से में रायसीना हिल्स वाले इलाके पर वायसराय हाउस बनाने का मन बनाया. यह इलाका खुला और हवादार था, ऊंचाई पर भी था इसलिए भविष्य में ड्रेनेज या सीवर वगैरह की परेशानी भी नहीं हो सकती थी. वहीं, लुटियंस द्वारा फिर एक नक्शा भी बनाया गया था।
राष्ट्रपति भवन बनाने के लिए किसने दी थी जमीन?
rashtrapatibhavan.gov.in पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रायसीना हिल्स की जिस जमीन को वायसराय हाउस के लिए चुना गया था, वह उस समय जयपुर के महाराजा के हिस्से में आती थी. उस वक्त रियासतों का जमाना था. वहीं, जब वायसराय हाउस बनकर तैयार हुआ तो सबसे आगे के हिस्से में एक स्तंभ लगाया गया. जिसे जयपुर स्तंभ भी कहते हैं. इसे जयपुर के महाराजा सवाई माधों सिंह ने गिफ्ट किया था।
अशोक हॉल (अशोक मंडप) की खासियत
अशोक हॉल जिसे अब अशोक मंडप के नाम से जाना जाएगा. राष्ट्रपति भवन की ऑफिशियली बेवसाइट के मुताबिक इसकी रोचक बात यह है कि कलात्मक रूप से निर्मित विशाल यह स्थान अब महत्त्वपूर्ण समारोहिक आयोजनों, विदेशों के मिशनों के प्रमुखों के पहचान-पत्र प्रस्तुत करने के लिए प्रयोग किया जाता है जिसे पहले स्टेट बॉल रूम के लिए उपयोग में लाया जाता था. इस कमरे की छत और फर्श दोनों का ही अपना आकर्षण है जबकि फर्श पूर्ण रूप से लकड़ी का बना हुआ है और इसकी सतह के नीचे स्प्रिंग लगे हुए हैं।
1.4 करोड़ रुपए में बनकर तैयार हुआ राष्ट्रपति भवन
मिली जानकारी के अनुसार, इस भवन के निर्माण के लिए 4,00,000 पाउंड का बजट मंजूर किया गया था लेकिन बनते-बनते लागत बढ़कर 8,77,136 पाउंड यानी उस समय के हिसाब से करीब 12.8 मिलियन रुपए तक पहुंच गई. इस इमारत के साथ-साथ मुगल गार्डन और कर्मचारियों के रहने के लिए आवास भी बनाया गया, जिससे यह लागत करीब 14 मिलियन यानी 1.4 करोड़ रुपए तक पहुंच गई।

