KinnarKuldevi : किन्नरों की कुलदेवी कौन है? :- Kinnar Ki Kuldevi तीज-त्योहार और तमाम मांगलिक कार्यों में दुआएं देकर नेग मांगने वाले किन्नरों को लेकर अक्सर लोगों के मन में तमाम तरह की जिज्ञासा बनी रहती है. मौजूदा समय में किन्नरों का अपना एक अखाड़ा है, लेकिन सवाल उठता है कि उसमें किस देवी या देवता की पूजा करते हैं? कहां है किन्नरों की कुल देवी का मंदिर और क्या है उसकी पौराणिक कथा? विस्तार से जानने के लिए पढ़ें ये लेख।
सनातन परंपरा किन्नर समाज का अपना एक अलग महत्वपूर्ण स्थान है. लोग इन्हें शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप मानते हैं. तीज-त्योहार और तमाम मांगलिक अवसरों पर दुआएं देने वाले इन किन्नरों के बारे में मान्यता है कि इनका आशीर्वाद बहुत जल्दी फलित होता है. समाज में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले इन किन्नरों को लेकर अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासाएं बनी रहती हैं कि ये लोग आखिर किस देवता की पूजा करते हैं? आखिर कौन हैं किन्नरों की कुलदेवी? आइए किन्नरों की आस्था से जुड़े पावन धाम यानि उनके कुलदेवी के मंदिर और उनकी कथा आदि के बारे में विस्तार से जानते हैं।
हिंदू मान्यता के अनुसार किन्नरों की कुलदेवी का पावन धाम गुजरात के मेहसाणा ज़िले में बेचराजी (Becharaji) नामक स्थान पर स्थित है, जिन्हें बहुचरा माता के नाम से जाना जाता है. बहुचरा माता के मंदिर देश के कई स्थानों पर है, लेकिन गुजरात का यह मंदिर उन सभी में सबसे शक्तिशाली पीठ के रूप में पूजा जाता है. यहां बहुचरा माता का दिव्य स्वरूप उग्र और तेजस्वी माना जाता है. देवी दुर्गा का स्वरूप मानी जाने वाली मां बहुचरा मुर्गे की सवारी करती हैं. किन्नर समाज से जुड़े लोग अपनी आराध्य देवी बहुचरा माता को अपनी मां, गुरु और संरक्षक मानते हैं. हालांकि देवी बहुचरा के मंदिर में सिर्फ किन्नर ही नहीं बल्कि सभी समाज के लोग उनकी साधना-आराधना के लिए पहुंचते हैं।
बहुचरा माता की कथा
प्राचीन लोक कथाओं के अनुसार बहुचरा माता एक बंजारे की पुत्री थीं. मान्यता है कि एक बार वे अपने काफिले के साथ यात्रा कर रही थीं, तभी बापिया नाम के डाकू ने उन पर हमला कर दिया. जिसके बाद उन्होंने अपने सम्मान रक्षा के लिए न सिर्फ अपने अंगों का बलिदान कर दिया बल्कि अपने प्राणों को भी त्याग दिया. ऐसा करते समय उन्होंने बापिया नामक डाकू को नपुंसक होने का श्राप दे दिया. जब बापिया को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसने देवी से क्षमा याचना की तो बहुचरा माता ने उन्हें स्त्री के वस्त्र धारण करके उनकी सेवा और प्रायश्चित करने को कहा. मान्यत है कि तभी से बहुचरा माता किन्नरों की कुलदेवी या फिर कहें आराध्य देवी बन गईं।

