GestationalDiabetes : जेस्टेशनल डायबिटीज क्या है ? जानिए बचाव के तरीके :- प्रेग्नेंसी के दौरान कई महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज की समस्या हो सकती है। ऐसे में इसे कंट्रोल में रखने के लिए कुछ आसान उपाय अपनाना फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए डाइट में हरी सब्जियां, साबुत अनाज और कम शुगर वाले फूड शामिल करें। साथ ही, रोजाना हल्की एक्सरसाइज या वॉक करने की आदत डालें, क्योंकि इससे ब्लड शुगर लेवल को संतुलित रखने में मदद मिल सकती है।
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प्रेग्नेंसी में मालूम पड़ती है जेस्टेशनल डायबिटीज
अमेरिकन प्रेगनेंसी एसोसिएशन की रिपोर्ट बताती है कि जेस्टेशनल डायबिटीज वह डायबिटीज है, जो पहली बार प्रेगनेंसी के दौरान पहली बार पता चलती है। अन्य प्रकार की डायबिटीज की तरह यह भी शरीर की कोशिकाओं द्वारा शुगर (ग्लूकोज) के इस्तेमाल को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण ब्लड में शुगर का स्तर बढ़ जाता है, जो गर्भावस्था और शिशु के स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।
प्रेग्नेंसी में क्यों होती है जेस्टेशनल डायबिटीज ?
जेस्टेशनल डायबिटीज मधुमेह का एक अस्थायी (ज्यादातर मामलों में) रूप होता है। यह समस्या तब होती है जब प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। इसे ग्लूकोज इनटोलरेंस या कार्बोहाइड्रेट इनटोलरेंस भी कहा जाता है।
जेस्टेशनल डायबिटीज से मां को होने वाले जोखिम
क्लीवलैंड क्लिनिक की रिपोर्ट के अनुसार, प्रेगनेंसी के दौरान डायबिटीज होने पर मां को हो सकने वाले खतरे:
प्रीक्लेम्पसिया: गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर होने की संभावना बढ़ जाती है।
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भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज: जेस्टेशनल डायबिटीज वाली महिलाओं में बाद में टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा थोड़ा ज्यादा होता है।
सिजेरियन डिलीवरी का बढ़ जाता है रिस्क
nature.com की रिपोर्ट के अनुसार, गर्भावधि मधुमेह और पहले से मौजूद डायबिटीज, दोनों ही गर्भावस्था और प्रसवकाल की अवधि में मां और शिशु के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में शिशु का वजन अक्सर सामान्य से अधिक हो जाता है और कभी-कभी यह 4 किलोग्राम या उससे ज्यादा तक पहुंच सकता है, जिसे मैक्रोसोमिया कहा जाता है।

