UttarakhandFoundationDay : “उत्तराखंड स्थापना दिवस विशेष” :- देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, आध्यात्मिक विरासत और हिमालय की ऊंची चोटियों से ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक लंबा संघर्ष, जनआंदोलन और हजारों लोगों का त्याग भी जुड़ा हुआ है। आज जिस उत्तराखंड को हम एक अलग राज्य के रूप में देखते हैं, उसके निर्माण की कहानी आंदोलनकारियों के संघर्ष, मातृशक्ति की अदम्य हिम्मत और शहीदों के बलिदान से लिखी गई है।
उत्तराखंड राज्य का निर्माण कोई एक दिन में लिया गया राजनीतिक फैसला नहीं था। यह दशकों तक चले उस संघर्ष का परिणाम था, जिसमें पहाड़ के लोगों ने अपने अधिकार, अपनी पहचान और अपने भविष्य के लिए आवाज बुलंद की।
अलग राज्य की मांग के पीछे क्या थी वजह ?
उत्तर प्रदेश का हिस्सा होने के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी क्षेत्रों से बिल्कुल अलग थीं। दुर्गम पहाड़, सीमित संसाधन, रोजगार के कम अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा प्रशासनिक पहुंच की कठिनाइयों ने यहां के लोगों को लंबे समय तक प्रभावित किया।
लोगों का मानना था कि लखनऊ में बैठकर पहाड़ की समस्याओं को उस संवेदनशीलता और प्राथमिकता से नहीं समझा जा सकता, जिसकी उन्हें जरूरत है। पहाड़ी क्षेत्र के विकास, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए अलग राज्य की मांग लगातार उठने लगी।
वर्ष 1938 में श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भी पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की मांग को समर्थन मिला। इसके बाद अलग राज्य की मांग विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर उठती रही।
1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन
अलग राज्य के आंदोलन को संगठित राजनीतिक दिशा देने में 26 जुलाई 1979 को स्थापित उत्तराखंड क्रांति दल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इंद्रमणि बडोनी, जिन्हें उत्तराखंड का गांधी भी कहा जाता है, इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को अलग राज्य की आवश्यकता समझाई। आंदोलन में छात्र, कर्मचारी, किसान, महिलाएं, सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व सैनिक बड़ी संख्या में जुड़ते चले गए।
वर्ष 1994 उत्तराखंड के इतिहास का सबसे निर्णायक दौर साबित हुआ। आरक्षण से जुड़े विवाद और अलग राज्य की मांग को लेकर बढ़ते असंतोष ने आंदोलन को व्यापक जनांदोलन में बदल दिया।
1 सितंबर 1994 को खटीमा में आंदोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग हुई। इस घटना में कई आंदोलनकारियों की जान चली गई।
इसके अगले दिन, 2 सितंबर 1994 को मसूरी में भी पुलिस फायरिंग हुई। इस घटना ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया।
लेकिन आंदोलन थमा नहीं। पहाड़ से लेकर मैदान तक अलग राज्य की मांग और तेज होती चली गई।
रामपुर तिराहा कांड: आंदोलन का सबसे दर्दनाक अध्याय
2 अक्टूबर 1994 की रात उत्तराखंड के आंदोलनकारी अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली में आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे। इसी दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर उन्हें रोक लिया गया।वहां हुई पुलिस कार्रवाई में कई आंदोलनकारियों की जान गई। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और यौन हिंसा की घटनाओं के आरोपों ने पूरे देश को झकझोर दिया। रामपुर तिराहा कांड उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास का ऐसा काला अध्याय बन गया, जिसे प्रदेशवासी आज भी पीड़ा और आक्रोश के साथ याद करते हैं।
इस घटना ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी और अलग राज्य की मांग राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उठने लगी।
मातृशक्ति की भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की कहानी मातृशक्ति के संघर्ष के बिना अधूरी है। गांवों की महिलाओं ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने जुलूस निकाले, धरने दिए, नारे लगाए और अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया।कई महिलाओं ने परिवार और घर की जिम्मेदारियों के साथ आंदोलन की जिम्मेदारी भी निभाई। पहाड़ की महिलाओं का यह साहस आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया। उत्तराखंड की मातृशक्ति ने साबित किया कि जब समाज अपने अधिकारों के लिए एकजुट होता है तो कोई भी संघर्ष असंभव नहीं रहता।
9 नवंबर 2000: संघर्ष को मिली ऐतिहासिक मंजिल
आखिरकार लंबे संघर्ष और जनभावनाओं के सम्मान में संसद ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पारित किया।
9 नवंबर 2000 को उत्तरांचल भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। बाद में 1 जनवरी 2007 को राज्य का नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया। यह दिन केवल एक नए राज्य के गठन का दिन नहीं था, बल्कि उन हजारों आंदोलनकारियों के सपनों की जीत थी, जिन्होंने अपनी पहचान और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष किया था।
26 वर्ष बाद भी एक बड़ा सवाल: क्या पूरे हुए आंदोलनकारियों के सपने?
उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इन वर्षों में प्रदेश ने शिक्षा, पर्यटन, सड़क, स्वास्थ्य, धार्मिक पर्यटन, महिला सशक्तीकरण और आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं।
लेकिन दूसरी ओर आज भी कई सवाल प्रदेश के सामने खड़े हैं।
* पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन।
* युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय रोजगार के अवसर।
* पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत।
* सरकारी स्कूलों और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता।
* गांवों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार।
* गैरसैंण को लेकर आंदोलनकारियों की भावनाएं और राजधानी का सवाल।
* राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान, पहचान और उनके लंबित मामलों का समाधान।
राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान और उनके आश्रितों के हितों के लिए क्षैतिज आरक्षण सहित कई व्यवस्थाएं की गई हैं, लेकिन आंदोलनकारियों की अपेक्षाओं और प्रदेश की वर्तमान चुनौतियों के बीच अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि
उत्तराखंड का इतिहास हमें याद दिलाता है कि यह राज्य किसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि जनभावनाओं, संघर्ष और बलिदान की उपज है।
खटीमा, मसूरी, रामपुर तिराहा और श्रीनगर के श्रीयंत्र टापू सहित आंदोलन के तमाम संघर्षस्थलों पर शहीद हुए आंदोलनकारियों का बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा।
आज जरूरत है कि प्रदेश की नीतियों और विकास की प्राथमिकताओं में पहाड़ के अंतिम गांव, अंतिम व्यक्ति, युवा, किसान और मातृशक्ति को केंद्र में रखा जाए।
उत्तराखंड केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं, बल्कि लाखों लोगों के सपनों, संघर्षों और भावनाओं का नाम है। शहीदों के सपनों का समृद्ध, आत्मनिर्भर और पलायनमुक्त उत्तराखंड बनाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

