अंडरवियर की कहानी : दुनिया में गारमेंट इंडस्ट्री में सबसे तेजी से बढ़ने वाला बाजार अंडरवियर, अंडर गारमेंट और इनरवियर का भी है. तमाम डिजाइन से लेकर रूप-रंगों में. आज हम जिन अंडरवियर का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसने हजारों सालों की यात्रा तय की है. पहली अंडरवियर की कहानी दिलचस्प ही है. 17वीं शताब्दी के अंत में (1699); खालसा सिखों के पांच प्रतीकों में से एक कच्छा ने कुर्ते के तहत एक और क्रांति ला दी. उत्तर भारत में आतंक मचाने वाले हथियारबंद लुटेरों के एक गिरोह ने कच्छा शब्द को अपना प्रतीक चिन्ह बना लिया. इस तरह कच्छा बनियान गिरोह का जन्म हुआ, जो हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कच्छा बनियान पहनकर हत्या और डकैती की वारदातों को अंजाम देता था।
ये थी पुराने समय की अंडरवियर
अगर आप तस्वीर में जूट की बनी अंडरवियर को देख रहे हैं तो हम आपको बता दें कि प्राचीन समय से मध्यकाल तक दुनियाभर में लोग ऐसी ही अंडरवियर पहना करते थे, जो त्रिभुजाकार होती थी. आमतौर पर हमारे देश में जब बच्चे छोटे होते हैं तो उन्हें इस तरह के तिकोने भी अंडरवियर के तौर पर पहनाए जाते हैं, जिन्हें आराम से बदला जा सके. प्राचीन अंडरवियर जूट, कपास और धागे के कपड़े से बनती थी. मध्यकाल के दौरान ये बदलना शुरू हुई. अब तो आधुनिक अंडरवियर और अंडर गारमेंट का जमाना है।
मिस्र में पहनी जाती थी लंगोट के तरह की शेंटी
हम आपको बताते हैं कि प्राचीन मिस्र के लोग अंदर लंगोट के तरह की शेंटी पहनते थे तो रोमन लोग सबलिग कुलम पहनते थे. बाद में मध्यकाल में यूरोप में कॉडपीस की शुरुआत हुई. इससे वो निजी अंगों को ढंकते थे. अंडरवियर का सबसे पहला रूप लंगोटी था. जो लगता है कि प्राचीन काल में पूरी दुनिया में ही पहनी जाती थी. इसे महिला और पुरुषों द्वारा पहना जाता था. कपड़े की पट्टियों से बनी होती थी जिसे पैरों के बीच से होकर कमर के चारों ओर बांधा जाता था. भारत में प्राचीन काल में लंगोट ही पहनी जाती थी।
कितनी पुरानी है लंगोट
कहा जा सकता है कि अंडरवियर का सबसे पहला ज्ञात रूप प्राचीन मिस्र में मिला. इसके अनुसार वहां 4,400 ईसा पूर्व में लंगोटी पहनी जाती थी. ये वस्त्र आमतौर पर लिनन से बनाए जाते थे. मध्य युग के दौरान, पुरुष शुरुआती बॉक्सर शॉर्ट्स जैसे कपड़े पहनते थे, जबकि महिलाओं के अंडरगारमेंट अधिक जटिल होते थे. अक्सर कोर्सेट और कपड़ों की परतें शामिल होती थीं।
पुरुषों और महिलाओं के लिए पैंटालून आए
19वीं सदी की शुरुआत में पैंटालून पुरुषों और महिलाओं के लिए किसी भी पोशाक का एक व्यावहारिक हिस्सा बन गया, जो मुख्य बाहरी कपड़ों के अंदर चिपके हुए पहने जाते थे, वो गंदगी और पसीने को सोखकर बाहरी कपड़ों को साफ रखते थे. इसके बाद ही कहीं ज्यादा आधुनिक अंडरवीयर और ब्रा डिजाइन हुए. जब साइकल आईं तो उस समय उन्हें चलाने के लिए अंदर बॉक्सर जैसे कपड़े आने लगे।
1928 में आर्थर नीबलर को कूपर अंडरवीयर कंपनी ने काम पर रखा, जहां परिधान इंजीनियर के तौर पर उसने जॉकस्ट्रैप की शैली में अंडरवियर ब्रीफ बनाए. 1935 में नीबलर के जॉकी शॉर्ट्स तुरंत हिट हो गए. भारत में जांघिए जैसा अंडरवियर 19वीं सदी में ही प्रचलित हुआ लेकिन 1950 और 1960 के दशक में अंडरवियर ऐसे आने लगे जो अंदर पहने जाने वाले अंडर गारमेंट के तौर पर ज्यादा आरामदायक और बेहतर थे. तब तक इनके रंग और नए तरह के कपड़ों का विकास भी हुआ. भारत में पहला अंडरवियर ब्रांड “लक्सर” माना जाता है, जिसकी स्थापना 1957 में हुई थी. इसे बिनोद कुमार टोडी द्वारा कोलकाता में शुरू किया गया. इससे पहले भारत में पारंपरिक रूप से अंडरगारमेंट्स का उपयोग किया जाता था, लेकिन संगठित रूप में ब्रांडेड अंडरवियर उद्योग 1950 के दशक के बाद ही विकसित हुआ. यानि देश में ब्रांडेड अंडरवियर की कहानी मुश्किल से 68 साल पुरानी है।

