AuliSnowfall : अचानक काले दिखने लगे बर्फ से ढके पहाड़ :- जहां कभी बर्फ़ से ढके पहाड़ पहचान थे… आज वहीं सूखापन एक चेतावनी बन गया है। जहां बर्फ़ पहाड़ों की पहचान थी, आज वहीं सूखापन एक सवाल बन गया है। हिमालय चुप है… लेकिन खतरा बोल रहा है।
हिमालय… जिसे भारत का जल टॉवर कहा जाता है, जहां से नदियां जन्म लेती हैं, जहां बर्फ़ सिर्फ सुंदरता नहीं, बल्कि ज़िंदगी की ज़रूरत है. लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई है।
जनवरी आधी बीत चुकी है, और हिमालय की चोटियां बर्फ़ के बिना सूनी पड़ी हैं।
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उत्तराखंड, हिमाचल और कई हिमालयी इलाकों में इस साल न बर्फ़बारी हुई, न बारिश। इसे वैज्ञानिक भाषा में कहा जा रहा है — “स्नो ड्रॉट”,
यानी बर्फ़ का सूखा।
औली, जो एशिया की सबसे बड़ी नैचुरल स्की स्लोप के लिए मशहूर है, आज वहां स्की नहीं… बल्कि धरना और नाराज़गी दिखाई दे रही है।
जहां हर साल जनवरी में पर्यटकों की भारी भीड़ होती थी, आज वहां सन्नाटा है। बीते 3 साल से औली में ठीक से बर्फ़ नहीं गिरी। इस बार तो हालात ऐसे हैं
कि बर्फ़ गिरी ही नहीं। इसी वजह से लोग सड़कों पर उतरे, नेताओं के पुतले जलाए गए, और सरकार से मांग की जा रही है कि आर्टिफिशियल स्नो बनाई जाए
ताकि पर्यटन बच सके।
यहां करीब 15 हजार लोगों की रोज़ी-रोटी सिर्फ पर्यटन और स्की पर टिकी थी, जो अब टूटने की कगार पर है।
क्या है वजह?
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह है — जलवायु परिवर्तन और कमजोर पश्चिमी विक्षोभ।
पश्चिमी विक्षोभ, जो भूमध्य सागर से नमी लेकर आते हैं, इस बार कमजोर रहे।
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नमी कम आई, तो न बारिश हुई, न बर्फ़।
आईएमडी के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय मोहपात्रा के मुताबिक, ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पश्चिमी जेट स्ट्रीम बदल रही है, जिससे पश्चिमी विक्षोभ उत्तर की ओर मुड़ रहे हैं।
नतीजा ये कि रूस और चीन 146 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है और हिमालय सूखा रह गया है।
चीन के उत्तर-पूर्वी इलाकों में भी भारी बर्फ़बारी हो रही है। लेकिन भारत के हिमालयी राज्य — उत्तराखंड और हिमाचल बर्फ़ के लिए तरस रहे हैं।
वैज्ञानिक चेतावनी
वाडिया इंस्टिट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. डोभाल कहते हैं— हिमालय को थर्ड पोल कहा जाता है, क्योंकि यहां आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद
सबसे ज्यादा ग्लेशियर हैं। लेकिन पिछले 10–15 सालों से स्नो कवर एरिया लगातार घट रहा है।
बर्फ़ गिर नहीं रही, और जो पहले से है, वो तेज़ी से पिघल रही है।छोटे ग्लेशियर टूट रहे हैं, एवलॉन्च का खतरा बढ़ रहा है, और पहाड़ नंगे दिखाई दे रहे हैं।
क्यों है ये खतरनाक?
इसका असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है।
• कृषि और बागवानी पर असर
• नदियों के जलस्तर में गिरावट
• भूजल संकट
• पर्यटन उद्योग ठप
• और आने वाले समय में
मैदानी इलाकों तक पानी का संकट
यानी कश्मीर से लेकर दिल्ली तक ये एक खतरे की घंटी है। बर्फ़ गिर नहीं रही, और जो पहले से है, वो तेज़ी से पिघल रही है।
छोटे ग्लेशियर टूट रहे हैं. एवलॉन्च का खतरा बढ़ रहा है. पहाड़ नंगे दिख रहे हैं। 1986–87 में सितंबर से ही बर्फ़ गिरने लगती थी।
आज सर्दियां छोटी होती जा रही हैं, और गर्मियां लंबी।
हिमालय का बिना बर्फ़ सूना होना सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है।
अगर अभी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां बर्फ़ को सिर्फ तस्वीरों में देखेंगी

