RammanFestival : हिमालय का रहस्य, जहां देवता खुद उतरते हैं जमीन पर :- “जहां हिमालय की वादियों में ढोल की गूंज सुनाई देती है और मुखौटों में इतिहास और आस्था जीवंत हो उठती है, वहीं हर साल उत्तराखंड के चमोली जिले के सालूर-डूंगरा गांव में मनाया जाने वाला राममन एक अनोखा सांस्कृतिक उत्सव बनकर सामने आता है।
यह सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोकजीवन, परंपरा और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण है, जिसे यूनेस्को ने 2009 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कर इसकी वैश्विक पहचान को भी मान्यता दी। हर साल अप्रैल के अंत में आयोजित होने वाला यह उत्सव स्थानीय ग्राम देवता भूमियाल देवता को समर्पित होता है, जिनके मंदिर परिसर में अधिकांश अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
बैसाखी के बाद शुरू होकर 10 से 13 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन राम महाकाव्य के पाठ, लोकगीतों और मुखौटा नृत्यों का अद्भुत संगम है, जिसमें रंगमंच, संगीत, ऐतिहासिक पुनर्निर्माण और मौखिक परंपराओं का सुंदर मेल देखने को मिलता है।
इस उत्सव की सबसे खास बात इसकी सामुदायिक भागीदारी है, जहां हर जाति और वर्ग की निर्धारित भूमिका होती है—युवा और बुजुर्ग कलाकार मंच पर प्रस्तुति देते हैं, ब्राह्मण पूजा और अनुष्ठानों का संचालन करते हैं, जबकि भंडारी समुदाय के लोग ही सबसे पवित्र नरसिंह मुखौटा धारण करने के अधिकारी होते हैं।
गांव का वह परिवार, जिसके घर साल भर भूमियाल देवता का निवास होता है, उसे कड़ी धार्मिक अनुशासन और दैनिक नियमों का पालन करना पड़ता है। इस पूरे आयोजन में ‘माल नृत्य’, ‘कूर्जोगी’ और रामकथा के सजीव मंचन जैसे कई आकर्षण शामिल होते हैं, जो न केवल आस्था बल्कि समाज के संघर्ष, इतिहास और जीवनशैली को भी दर्शाते हैं।
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करीब 500 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित है—जहां बच्चे इसे देखकर सीखते हैं और बुजुर्ग इसे निभाते हैं। राममन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समुदाय की पर्यावरणीय, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतिबिंब है, जो लोगों के आत्मसम्मान को मजबूत करता है और उनकी जड़ों से जुड़े रहने का एहसास कराता है।
हालांकि बदलते समय, तकनीकी प्रभाव और संसाधनों की कमी के चलते इस विरासत पर खतरा भी मंडरा रहा है, लेकिन स्थानीय समुदाय इसके संरक्षण और प्रसार के लिए लगातार प्रयासरत है, ताकि यह अनमोल धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।”

