SchoolNewspaperReading : स्कूलों में प्रार्थना के बाद 10 मिनट अखबार पढ़ना अनिवार्य :- सभी सरकारी और निजी स्कूलों के लिए एक नया और अहम नियम लागू किया है। इसके तहत अब स्कूलों में प्रार्थना सभा के बाद सभी विद्यार्थियों को रोजाना 10 मिनट तक अखबार पढ़ना अनिवार्य होगा। सरकार का कहना है कि इस फैसले का मकसद बच्चों की पढ़ने की आदत को बढ़ाना, उनका सामान्य ज्ञान विकसित करना और स्क्रीन टाइम को कम करना है। शिक्षा विभाग की ओर से जारी आदेश के मुताबिक यह नियम प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर तक के सभी स्कूलों पर लागू होगा। स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के समाचार पत्र उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे बहुभाषी ज्ञान हासिल कर सकें।
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टीवी, मोबाइल से दूरी बनाने के लिए उठाया गया है कदम , राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों के प्रति होंगे जागरूक
मोबाइल और सोशल मीडिया की लत ने यंगिस्तान को पढ़ाई से दूर कर दिया है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चे वर्चुअल दुनिया में ऐसे खो गए हैं कि उन्हें अपने आस पड़ोस में क्या हो रहा, इसकी कोई खबर तक नहीं रहती। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल देखना शुरू कर देते हैं और शाम तक यही प्रक्रिया चली रहती है। कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा दिया। अब यह कहीं न कहीं बच्चों के भविष्य में रुकावट बन रहा है। बच्चे अब पढ़ाई और खेल मैदान से दूर होते जा रहे हैं। समय समय पर प्रबुद्ध लोगों ने मोबाइल फोन के बढ़ते प्रचलन पर चिंता जताई है।सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत युवाओं को न केवल पढ़ाई से दूर कर रही है, बल्कि युवा वर्ग खेल के मैदान से भी दूर होता जा रहा है। अभिभावकों को इस विषय पर ध्यान देने की खासी जरूरत है। लाड प्यार में बच्चों और युवाओं का भविष्य बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश की सरकार ने इस हालात से निबटने के लिए प्राथमिक कदम उठाया है। इससे विद्यार्थियों को कई फायदे होंगे। देश के हर स्कूल में प्रार्थना सभा के दौरान कुछ समय अखबार पढ़ने के लिए निर्धारित होना चाहिए। आज जब डिजिटल माध्यमों पर हद से ज्यादा निर्भरता बढ़ गई है और फेक न्यूज का तेजी से प्रचार-प्रसार हो रहा है, तब अखबार ही जागरूकता का सबसे बड़ा जरिया है। जो बच्चे रोजाना अखबार पढ़ते हैं, उनका शब्दज्ञान बेहतर हो जाता है। उनमें पढ़ने की आदत तो विकसित होती ही है, वे अपने विचारों को अधिक कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त कर पाते हैं। ऐसे विद्यार्थी एकाग्रचित्त होकर अध्ययन कर पाते हैं। परीक्षा में उत्तर लिखते समय इसका फायदा होता है।
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प्रायः ऐसे प्रयासों को यह कहकर खारिज किया जाता है कि ‘स्कूली बच्चों का खबरों की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं होता, लिहाजा उन्हें सिर्फ पाठ्यपुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।’ वास्तव में यह धारणा सही नहीं है। भले ही अखबारों में छपने वाली खबरों का स्कूली पढ़ाई और परीक्षाओं से ज्यादा संबंध न हो, लेकिन उन्हें पढ़ने-सुनने से विद्यार्थियों के सोचने-समझने का नजरिया बदलता है। चाहे उन्हें शुरुआत में कई खबरें समझ में न आएं। एक समय ऐसा आएगा, जब वे खबरों में रुचि लेने लगेंगे। उनकी समझ बढ़ेगी। आज स्कूलों में कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें फिल्मी सितारों के बारे में तो बहुत कुछ मालूम है। वे देश के प्रमुख पदों पर सेवारत लोगों के नाम नहीं जानते।
ये बच्चे जब भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं तो बहुत मुश्किलों का सामना करते हैं। इन्हें सामान्य ज्ञान और समसामयिक घटनाओं के बारे में कई किताबें पढ़नी पड़ती हैं। इसमें काफी समय लगता है। स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर देने से इन बच्चों का भला हो जाएगा। कई लोग कहते हैं- ‘बच्चे स्कूलों में अखबार पढ़ेंगे तो बाकी पढ़ाई कब करेंगे? क्या इससे कक्षाओं के कालांश बाधित नहीं होंगे?’ ऐसी आशंकाएं निराधार हैं। प्रार्थना सभा में अखबार की बड़ी खबरें पढ़ने में 10 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा। अगर कोई ऐसी खबर है, जिससे सामान्य ज्ञान आदि का प्रश्न बनाया जा सकता है तो उसे स्कूल के नोटिस बोर्ड पर लिखा जा सकता है। बाद में, बच्चे वहां से अपनी नोटबुक में लिख सकते हैं।

