RaulanMahotsav : पुरुष बनते हैं दुल्हन, शराब से होती है पूजा… क्यों खास है हिमाचल का राउलाने मेला? :- हिमालय की बर्फीली वादियों में एक ऐसा रहस्यमय उत्सव… जहां दुल्हन बनते हैं पुरुष और सदियों पुरानी परंपराएं आज भी जीवित हैं!” नमस्कार, आप देख रहे हैं खोजी नारद। आज हम आपको ले चलते हैं हिमालय की ऊंचाइयों पर बसे एक ऐसे गांव में, जहां हजारों साल पुरानी परंपरा आज भी पूरे गर्व और आस्था के साथ निभाई जाती है।
Kalpa गांव, जो Kinnaur जिले में Himachal Pradesh के भीतर स्थित है, अचानक पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है।दरअसल, पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी तस्वीरें वायरल हुईं, जिनमें नकाबपोश पुरुष पारंपरिक किन्नौरी पोशाक और भारी आभूषणों में सजे दिखाई दे रहे हैं।
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बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच, हाथों में चाकू लिए ये लोग एक अनोखा नृत्य करते नजर आ रहे हैं।इन तस्वीरों ने लोगों के मन में एक ही सवाल खड़ा कर दिया— आखिर यह रहस्यमय उत्सव क्या है? दरअसल, यह है रौलान महोत्सव, जो इस क्षेत्र की सबसे पुरानी जीवित परंपराओं में से एक माना जाता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह पर्व करीब पांच हजार साल पुराना है और इसे हर साल मार्च-अप्रैल के बीच मनाया जाता है, अक्सर होली के दो दिन बाद। यह उत्सव लगभग पांच से सात दिनों तक चलता है। इस महोत्सव का आयोजन मुख्य रूप से गांव के पवित्र मंदिरों— जैसे नागिन नारायण मंदिर और संतांग मंदिर— में किया जाता है।
यहां धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक संगीत और रहस्यमय नृत्य पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं। इस उत्सव के दो मुख्य पात्र होते हैं— राउला और राउलेन दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों भूमिकाओं को पुरुष ही निभाते हैं।
राउला अपने चेहरे को पूरी तरह बुने हुए कपड़े से ढक लेता है ताकि उसके शरीर का कोई हिस्सा दिखाई न दे। वहीं राउलेन दुल्हन की तरह सजता है— किन्नौरी महिलाओं के पारंपरिक वस्त्र दोरू, चोली और पट्टू के साथ-साथ कई किलो वजनी चांदी और सोने के पैतृक आभूषण पहनता है। मंदिर के भीतर दोनों एक धीमा और ध्यानमग्न नृत्य करते हैं।
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मान्यता है कि यह नृत्य मानव जगत और दिव्य शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि सर्दियों के मौसम में सौनी नाम की दिव्य परी आत्माएं पहाड़ों से उतरकर गांव की रक्षा करती हैं।
रौलान महोत्सव उनके प्रति आभार व्यक्त करने और वसंत ऋतु में उन्हें विदाई देने का प्रतीक है।उत्सव के दौरान ग्रामीण जुलूस निकालते हैं और जौ के आटे यानी सत्तू को हवा में उछालते हैं, जो समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
आज जब आधुनिक दुनिया में कई परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, वहीं Kalpa का यह रौलान महोत्सव हमें याद दिलाता है कि संस्कृति और आस्था की जड़ें जितनी पुरानी होती हैं, उतनी ही मजबूत भी होती हैं। तो अगली बार जब आप हिमाचल की यात्रा करें, हो सकता है आप भी इस जादुई त्योहार को अपनी आंखों से देख सकें।

