RembalAgroAndFoods : आस्था का मुखौटा और मांस का व्यापार? :- “सियासत के गलियारों में जहाँ ‘गौ-सेवा’ के नारे गूँजते हैं, वहीं पर्दे के पीछे व्यापार के कुछ ऐसे तार जुड़ते हैं जो सबको हैरान कर देते हैं। एक ऐसे ही सनसनीखेज मामले सामने आया है जहाँ कानून, कंपनी और रसूखदार नाम एक साथ कटघरे में खड़े हैं।”नमस्कार आप देख रहे हैं खोजी नारद : ‘Rembal Agro’ और बीफ तस्करी का सच? महाराष्ट्र पुलिस ने हाल ही में Rembal Agro and Foods कंपनी का एक ट्रक पकड़ा है, जिसमें बीफ (गोमांस) होने का संदेह है। इस घटना ने एक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है क्योंकि इस कंपनी के तार कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और उनके परिवार से जुड़े होने का दावा किया जा रहा है।
नितिन गडकरी जो खुद परिवहन मंत्री हैं ट्रक पकड़े जाने के बाद कंपनी ने दावा किया कि यह गोमांस नहीं, बल्कि भैंस का मांस (काराबीफ) है। हालांकि, संदेह तब गहराया जब यह पता चला कि मांस हैदराबाद से मुंबई ले जाया जा रहा था, लेकिन उस पर सर्टिफिकेट उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के पशु चिकित्सा अधिकारी का लगा हुआ था। कंपनी के पास हैदराबाद के स्थानीय पशुपालन विभाग का अनिवार्य सर्टिफिकेट मौजूद नहीं था।
न्यायाधीश ने भी टिप्पणी की कि कंपनी के पास यह साबित करने के लिए ठोस सबूत नहीं हैं कि मांस वास्तव में भैंस का ही है। लॉजिस्टिक्स और फंडिंग: रिपोर्ट्स के अनुसार, Rembel के लॉजिस्टिक्स संचालन को कथित तौर पर नितिन गडकरी के परिवार के स्वामित्व वाली कंपनियों द्वारा फंड दिया जाता है।
इसके बदले में, मांस व्यापार से जुड़ी इन कंपनियों के शेयरधारकों ने गडकरी के बेटे द्वारा संचालित कंपनी ‘Sian Agro Capital’ में निवेश किया है। बैंक और लोन का कनेक्शन: इस मांस व्यापारी कंपनी को एक सहकारी बैंक से बड़ा लोन मिला है, जिसकी अध्यक्ष नितिन गडकरी की पत्नी कंचन गडकरी हैं।Rembel के प्रबंध निदेशक महेश कुमार बालकृष्णन पिल्लई का संबंध गडकरी की कंपनियों से बताया जा रहा है।
बड़ी अपडेट एक क्लिक में :- JhandaJiMelaDehradun : 8 मार्च से शुरू होगा ऐतिहासिक श्री झण्डा महोत्सव
साथ ही, शारजाह स्थित ‘पिक्चर इंटरनेशनल’ कंपनी, जो Rembel से मांस खरीदती है, उसके निदेशक को भी गडकरी की कंपनी से लोन मिलने की बात सामने आई है।यह रिपोर्ट गंभीर सवाल उठाती है कि एक तरफ जहाँ ‘गौ-रक्षण’ की कसमें खाई जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ गोमांस के व्यापार से जुड़ी कंपनियों और बड़े राजनीतिक चेहरों के बीच कथित तौर पर यह वित्तीय लेन-देन आखिर क्या दर्शाता।
“जुबां पर नाम सेवा का, मगर व्यापार कुछ और है।
जो दिख रहा है साफ़-साफ़, वो किरदार कुछ और है।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे, तो फरियाद किससे करें?
यहाँ सजे हैं जो चेहरे, उनके पीछे का नकाब कुछ और है।
सत्यता की पुष्टि कानूनी जांच का विषय है, लेकिन सवाल पूछना हमारा हक है।

