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राष्ट्रीय

50 पैसे की थाली से 100 रुपये तक का सफर

50 पैसे की थाली का 100 रुपये तक का सफर: कीमतों के पीछे की वजहें जानें।

admin
Last updated: 2024/12/03 at 6:21 AM
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5 Min Read
50 पैसे की थाली
50 पैसे की थाली
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Highlights
  • 50 पैसे से 100 रुपये तक का सफर.
  • थाली की बढ़ती कीमतों का सच.
  • 50 पैसे से 100 रुपये: बदलाव की कहानी.

50 पैसे की थाली से 100 रुपये तक का सफर : संसद का शीतकालीन सत्र जारी है। इसी बीच सांसदों, पत्रकारों और आगंतुकों की संख्या भी संसद परिसर में बढ़ जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि संसद परिसर में एक कैंटीन भी है, जहां खाने के दाम आम होटलों की तुलना में आज भी किफायती हैं। इस कैंटीन का इतिहास 70 साल पुराना है, और इसमें समय-समय पर कई बड़े बदलाव हुए हैं।

Contents
संसद कैंटीन: आज और कल की तुलनाParliament canteen: 50 पैसे से 100 रुपये तक का सफरकैंटीन में हुए बदलाव का सफर2008: ईंधन प्रणाली में बड़ा बदलाव2021: भारतीय पर्यटन विकास निगम ने संभाली जिम्मेदारीवर्तमान में संसद कैंटीन के रेटकैंटीन की वर्तमान व्यवस्थासांसदों और आम लोगों की यादें

संसद कैंटीन: आज और कल की तुलना

आज संसद कैंटीन में एक रोटी की कीमत केवल 3 रुपये है। वहीं, शाकाहारी थाली 100 रुपये और चिकन बिरयानी 100 रुपये में उपलब्ध है। परंतु एक समय ऐसा भी था, जब यह शाकाहारी थाली मात्र 50 पैसे में मिलती थी। आज के समय में यह दरें अन्य रेस्तरां और होटलों के मुकाबले काफी सस्ती हैं, लेकिन आजादी के बाद के शुरुआती दिनों में यह और भी किफायती थीं।

Parliament canteen: 50 पैसे से 100 रुपये तक का सफर

आजादी के बाद की कैंटीन व्यवस्था : आजादी के तुरंत बाद, संसद परिसर में एक छोटी सी कैंटीन स्थापित की गई थी। तब इसे नॉर्दर्न रेलवे द्वारा संचालित किया जाता था। 1950 से 1960 के दशक में, इस कैंटीन में केवल पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते थे। खाना बनाने के लिए गैस चूल्हे का उपयोग नहीं होता था। उस समय सांसदों को 50 पैसे में शाकाहारी थाली, 2 पैसे में रोटी और 10 पैसे में चाय मिलती थी।

कैंटीन में हुए बदलाव का सफर

1960 के दशक में कैंटीन में बड़े बदलाव देखने को मिले। एलपीजी गैस का उपयोग शुरू हुआ और सुविधाएं बढ़ाई गईं। 1968 में भारतीय रेलवे के उत्तरी क्षेत्र ने कैंटीन संचालन की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद, मेन किचन की स्थापना की गई, जहां भोजन तैयार किया जाता था और फिर इसे पांच अलग-अलग कैंटीनों में गर्म करके परोसा जाता था।

1980 और 1990 के दशक तक कैंटीन में सब्सिडी वाली दरें बनी रहीं। 1990 के दशक तक शाकाहारी थाली 30 रुपये में और चिकन करी 50 रुपये में उपलब्ध थी। रोटी का दाम मात्र 2 रुपये था। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीता, सुविधाओं में सुधार हुआ और खाने के दाम भी धीरे-धीरे बढ़ने लगे।

2008: ईंधन प्रणाली में बड़ा बदलाव

2008 में कैंटीन की ईंधन प्रणाली में बड़ा बदलाव किया गया। गैस लीक और उपकरणों की खराबी के कारण पारंपरिक ईंधन प्रणाली को हटाकर इलेक्ट्रिक कुकिंग इक्विपमेंट का उपयोग शुरू किया गया। आज, संसद कैंटीन में भोजन पूरी तरह से इलेक्ट्रिक उपकरणों पर पकाया जाता है।

2021: भारतीय पर्यटन विकास निगम ने संभाली जिम्मेदारी

2021 में, भारतीय पर्यटन विकास निगम (ITDC) ने कैंटीन का संचालन संभाल लिया। इसके बाद, खाने की गुणवत्ता और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। हालांकि, खाने के आइटम्स की संख्या घटकर 90 से 48 हो गई। अब यहां बाजरे से बने व्यंजन भी शामिल किए गए हैं।

वर्तमान में संसद कैंटीन के रेट

संसद कैंटीन के वर्तमान रेट निम्नलिखित हैं:

  • शाकाहारी थाली: 100 रुपये.
  • चिकन बिरयानी: 100 रुपये.
  • चिकन करी: 75 रुपये.
  • सैंडविच: 3-6 रुपये.
  • रोटी: 3 रुपये.

कैंटीन की वर्तमान व्यवस्था

संसद सत्र के दौरान कैंटीन में प्रतिदिन लगभग 500 लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। सुबह 11 बजे तक भोजन बनकर तैयार हो जाता है। इसके लिए सब्जियां, दूध और मसाले सुबह ही मंगवाए जाते हैं। कैंटीन का संचालन एक संसदीय समिति द्वारा देखा जाता है, जो गुणवत्ता और व्यवस्था की निगरानी करती है।

सांसदों और आम लोगों की यादें

कैंटीन में जवाहरलाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने खाना खाया है। पुराने समय में यह कैंटीन न केवल सांसदों बल्कि पत्रकारों और आगंतुकों के लिए भी चर्चा का विषय होती थी।

संसद कैंटीन का सफर भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 50 पैसे की थाली से लेकर 100 रुपये की थाली तक, इस कैंटीन ने समय के साथ अपने स्वरूप और कार्यप्रणाली में बदलाव देखा है। हालांकि, यह आज भी अपनी किफायती दरों और उच्च गुणवत्ता वाले भोजन के लिए जानी जाती है।

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