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भारत का सबसे रहस्यमयी परमाणु जासूसी मिशन

ऑपरेशन हिमालयन ब्लैकआउट यह कहानी शुरू होती है 1965 के दशक में जब भारत और चीन के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो चुके थे.

admin
Last updated: 2025/08/18 at 11:29 AM
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Highlights
  • भारतीय सेना के चुनिंदा अधिकारी और अमेरिका के उच्च प्रशिक्षित सीआईए एजेंट शामिल थे इस मिशन को अंजाम देने के लिए नंदा देवी चोटी को चुना गया जो भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है.
  • सरकारों ने चुप्पी साध ली न कोई बयान आया न कोई रिपोर्ट जारी हुई कहा जाता है कि वह डिवाइस ग्लेशियर में फिसल गई.
  • आज भी नंदा देवी के आसपास स्थानीय लोग बताते हैं कि वहां की बर्फ चमकती है और कुछ जगहों पर कंपास काम नहीं करता क्या यह न्यूक्लियर डिवाइस के असर का प्रमाण है या फिर ये केवल लोककथाएं.

भारत का सबसे रहस्यमयी परमाणु जासूसी मिशन :- नमस्कार मैं हूँ अनन्या सहगल और आप देख रहे हैं खोजी नारद एक ऐसा मंच जहाँ हर खबर के पीछे छिपे रहस्य से उठता है पर्दा और आज की रिपोर्ट तो इतनी चौंकाने वाली है कि आपको यकीन नहीं होगा आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे विषय की जिसने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा रखा है और वो विषय है भारत का सबसे रहस्यमयी परमाणु जासूसी मिशन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत के इतिहास में ऐसा कौन सा मिशन हुआ है जिसके बारे में सरकार ने आज तक चुप्पी साध रखी है जिसके दस्तावेज़ न तो लोकसभा में खुले और न ही आरटीआई में सामने आए ऐसा मिशन जिसे जानने वाले लोग गुमनामी में खो गए जिसका नाम तक लोगों की जुबान पर आते ही रोक दिया गया जी हां आज हम बात करने जा रहे हैं भारत के सबसे गुप्त परमाणु जासूसी मिशन की एक ऐसा मिशन जो अगर असफल हो जाता तो भारत का नाम इतिहास से मिट सकता था लेकिन अगर सफल होता तो भारत एक नई महाशक्ति बनकर उभरता इस मिशन का नाम है ।

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ऑपरेशन हिमालयन ब्लैकआउट यह कहानी शुरू होती है 1965 के दशक में जब भारत और चीन के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो चुके थे 1962 की लड़ाई के बाद भारत ने महसूस किया कि चीन की सामरिक शक्ति को समझना और उस पर नजर रखना बेहद जरूरी है लेकिन सवाल था कि आखिर इतनी ऊंचाई वाले हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में जाकर चीन के परमाणु परीक्षणों पर कैसे नजर रखी जाए यहीं से जन्म होता है उस मिशन का जो आज भी फाइलों में ब्लैकआउट है सीआईए यानी अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी और भारत की रॉ यानी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग ने मिलकर एक गुप्त योजना बनाई इस योजना का उद्देश्य था हिमालय की एक ऊंची चोटी पर एक परमाणु संचालित जासूसी यंत्र यानी न्यूक्लियर पॉवर्ड सेंसर स्थापित करना जो चीन के परमाणु परीक्षणों और मिसाइल गतिविधियों की जानकारी भारत और अमेरिका दोनों को दे सके चौंकाने वाली बात ये थी कि इस यंत्र को चलाने के लिए एक मिनिएचर न्यूक्लियर रिएक्टर का इस्तेमाल किया गया जो आज भी उस क्षेत्र में दफन है यह मिशन इतना गुप्त था कि इसे करने वाले पर्वतारोही भी नहीं जानते थे कि वे क्या ले जा रहे हैं ।

इसमें भारतीय सेना के चुनिंदा अधिकारी और अमेरिका के उच्च प्रशिक्षित सीआईए एजेंट शामिल थे इस मिशन को अंजाम देने के लिए नंदा देवी चोटी को चुना गया जो भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है और जहां पहुंचना आसान नहीं बल्कि जानलेवा है 1965 में ऑपरेशन की शुरुआत हुई जैसे ही टीम नंदा देवी चोटी पर पहुंची मौसम ने ऐसा रौद्र रूप धारण किया कि पूरा मिशन खतरे में पड़ गया जान बचाने के लिए टीम को न्यूक्लियर डिवाइस वहीं छोड़नी पड़ी और वे नीचे उतर आए कुछ दिनों बाद जब मिशन टीम वापस गई तो उन्हें वह डिवाइस वहां नहीं मिली जी हां एक न्यूक्लियर डिवाइस जो रेडियोएक्टिव थी जो पूरी घाटी को जहरीला बना सकती थी वह रहस्यमयी तरीके से गायब हो चुकी थी।

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सरकारों ने चुप्पी साध ली न कोई बयान आया न कोई रिपोर्ट जारी हुई कहा जाता है कि वह डिवाइस ग्लेशियर में फिसल गई या हिमस्खलन की चपेट में आ गई लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि वह डिवाइस किसी दुश्मन देश के हाथ लग गई जिसका इस्तेमाल किसी बड़े परमाणु प्लान में हुआ इतना ही नहीं कई पर्वतारोहियों की रहस्यमयी मौतें इस मिशन से जुड़ी पाई गईं कुछ की लाशें आज तक नहीं मिलीं कुछ के शरीर में रेडियोएक्टिव असर देखे गए और कुछ ने इस मिशन की बात करते करते अचानक चुप्पी साध ली जैसे कोई अदृश्य ताकत उन्हें रोक रही हो एक समय के बाद जब इस मिशन की भनक मीडिया को लगी तो कुछ विदेशी रिपोर्ट्स में इसका ज़िक्र आया लेकिन भारत सरकार ने हमेशा इस पर नो कमेंट कहा यहां तक कि जब आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई तो जवाब मिला कि इस विषय पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है ।

आज भी नंदा देवी के आसपास स्थानीय लोग बताते हैं कि वहां की बर्फ चमकती है और कुछ जगहों पर कंपास काम नहीं करता क्या यह न्यूक्लियर डिवाइस के असर का प्रमाण है या फिर ये केवल लोककथाएं हैं और कुछ ने इस मिशन की बात करते करते अचानक चुप्पी साध ली जैसे कोई अदृश्य ताकत उन्हें रोक रही हो एक समय के बाद जब इस मिशन की भनक मीडिया को लगी तो कुछ विदेशी रिपोर्ट्स में इसका ज़िक्र आया लेकिन भारत सरकार ने हमेशा इस पर नो कमेंट कहा यहां तक कि जब आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई तो जवाब मिला कि इस विषय पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है ।

आज भी नंदा देवी के आसपास स्थानीय लोग बताते हैं कि वहां की बर्फ चमकती है और कुछ जगहों पर कंपास काम नहीं करता क्या यह न्यूक्लियर डिवाइस के असर का प्रमाण है या फिर ये केवल लोककथाएं हैं दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है कि आज उस डिवाइस का क्या हुआ होगा क्या वह अभी भी हिमालय की बर्फ में दबा पड़ा है या वह किसी अज्ञात देश की प्रयोगशाला में प्रयोग किया जा रहा है कौन थे वे जांबाज जिन्होंने यह मिशन पूरा करने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल दी कहीं आप जिन रहस्यों को अफवाह समझते हैं वही देश की सबसे बड़ी जासूसी कहानी तो नहीं मैं हूं अनन्या सहगल और आप देख रहे हैं खोजी नारद जहां हर परदा उठता है हर रहस्य सामने आता है और हर कहानी होती है चौंकाने वाली ऐसी ही एक और रहस्यगाथा के साथ फिर मिलेंगे तब तक याद रखिए कुछ मिशन सिर्फ इतिहास नहीं बनाते बल्कि सदियों तक राज भी बन जाते हैं ।

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