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राष्ट्रीय

WajidAliShah : वाजिद अली शाह ने कैसे चुनीं 375 बेगमें ?

बीवियों को बीस रूपये तक मिलता था खर्च!

admin
Last updated: 2026/07/13 at 10:39 AM
admin
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9 Min Read
WajidAliShah
WajidAliShah : वाजिद अली शाह ने कैसे चुनीं 375 बेगमें ?
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Highlights
  • कैसर बेगम ने दिया सुजाक का रोग.
  • अफ्रीकन काली बीवियां थीं खूब पसंद.
  • समय से पहले सातवें महीने में एक कमजोर लड़के को जन्म दिया.

WajidAliShah : वाजिद अली शाह ने कैसे चुनीं 375 बेगमें ? :-  अवध के आख़िरी बादशाह वाज़िद अली शाह ने तकरीबन 375 शादियां क्यों कीं? कोलकाता में रहने वाले उनके एक वंशज के मुताबिक बादशाह इतना पवित्र व्यक्ति था, कि किसी स्त्री को विवाह के बिना खिदमत का मौका देना मुनासिब नहीं मानता था. बादशाह की बीवियों की तीन श्रेणियां थीं. जिन्होंने बादशाह के बच्चों को जन्म दिया उन्हें महल का दर्जा देकर पर्दे में कर दिया जाता था. जिन्होंने बच्चों को जन्म नहीं दिया वे बेगम कही गईं. सबसे निचला दर्जा खिलावती का था, जो घरेलू नौकरों की तरह काम करती थीं लेकिन बादशाह से शादी की डोर में बंधी रहती थीं।

Contents
बीवियों को बीस रूपये तक मिलता था खर्च!कैसर बेगम ने दिया सुजाक का रोगअफ्रीकन काली बीवियां थीं खूब पसंद

शादियों के मामले में पसंद की बीवियों की तलाश के बादशाह के पास कई रास्ते थे. किसी पर बादशाह की सीधे निगाह पड़ी तो रीझ गए. कुछ को बेगमें या उनके घर वाले पेश कर देते थे. कारिंदे भी इसे बादशाह को खुश करने का बढ़िया जरिया मानते थे. काले रंग की बीवियां बादशाह की खास पसंद में शामिल थीं. वे अफ्रीकन अंगरक्षिकाएं साथ लेकर चलते थे. उनमें कई उनकी बीवियां बन गईं. पढ़िए अवध के रंगीले बादशाह से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से।

1847 में 26 साल वाज़िद अली शाह अवध के बादशाह बने. अगले दो साल के भीतर उन्होंने अपनी प्रेमकथाएं “परीख़ाना” में लिखी. उसमें बेबाकी के साथ लिखा कि जब वे सिर्फ आठ साल के थे, तो देखभाल के लिए लगी अधेड़ रहीमन उन पर हावी हो गई. विरोध करने पर वह धमकाने लगी. फिर अगले दो साल यह सिलसिला चला।

उसकी बर्खास्तगी के बाद 35-40 साल की अमीरन आई. हमेशा चटकीली कपड़ों में सजी-धजी अमीरन उन्हें लुभाने लगी. उससे रिश्ते बिना भय और दबाव के रहे.आगे गोमती किनारे पिता के महल छतर मंजिल के भीतर और आसपास शहजादे के प्रेम-विलास का सिलसिला चलता रहा. पंद्रह साल की उम्र में उनका पहला निकाह अपने से पांच साल बड़ी जिस लड़की से हुआ ,वे आगे “ख़ास महल” कहलाईं. परीख़ाना लिखने की शुरुआत तक उनकी लगभग दो दर्जन शादियां हो चुकी थीं. तब वे कैसा महसूस करते थे? उन्होंने लिखा, “प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर से प्रेम का उपहार मिला है. लेकिन जो अनंत बसंत का बाग होना चाहिए,वो मेरे लिए एक खर्चीला जंगल हो चुका है.”

बीवियों की बड़ी तादाद और उनकी खींचतान के चलते होने वाली मुश्किलों के बाद भी बादशाह की शादियों की तलब में कोई कमी नहीं आई. ये तादाद 375 तक पहुंची. इस्लाम जिसमें बीवियों की तादाद चार तक महदूद है और सभी के साथ एक से बर्ताव की शर्त है, वहां बादशाह के लिए इतनी शादियां कैसे मुमकिन हुईं? इसके लिए बादशाह ने मुताह (अस्थायी विवाह) की रीति का सहारा लिया, जिसमें शादी एक दिन से एक वर्ष या फिर उससे आगे भी चल सकती है।

अनेक शर्तों से पाबन्द यह शादी ईसाई और यहूदी लड़कियों से ही की जा सकती है और इससे होने वाले बच्चे वैध माने जाते हैं. “भारत में आखिरी बादशाह- वाज़िद अली शाह” की लेखिका रोजी लिवेनन से कोलकाता में रहने वाले बादशाह के एक वंशज ने इन शादियों के पक्ष में दलील दी थी,” बादशाह इतना पवित्र व्यक्ति था, कि किसी औरत से शादी के बिना उसे खिदमत का मौका देना मुनासिब नहीं मानता था!

बीवियों को बीस रूपये तक मिलता था खर्च!

बादशाह से शादी बाद इन बीवियों की जीवन-शैली और उनकी हैसियत के बारे में जानना दिलचस्प है. उम्मीद यही की जाएगी कि शादी बाद हरम में पहुंचने वाली बीवियां ठाठ और विलासिता की जिंदगी गुजारती रही होंगी. लेकिन असलियत में यह चंद बीवियों के ही नसीब में था।

मुताह जरिए शादी करने वाली औरतों को शादी खत्म होने के बाद गहने-कपड़े तक वापस करने पड़ते थे. असलियत में बादशाह की मुताह बीवियों की तीन श्रेणियां थीं. जिन्होंने बादशाह के बच्चों को जन्म दिया उन्हें महल का दर्जा देकर पर्दे में कर दिया जाता था. जिन्होंने बच्चों को जन्म नहीं दिया वे बेगम कही गईं. सबसे निचला दर्जा खिलावती का था, जो घरेलू नौकरों की तरह काम करती थीं लेकिन बादशाह से शादी की डोर में बंधी रहती थीं।

सबसे ऊंचे दर्जे की महल बीबी को सोलह सौ रुपया महीना खर्च को मिलता था. बेगमों को सौ रुपया और खिलावती के लिए बीस रूपये तय थे. दिलचस्प है कि पूरी तयशुदा रकम उनके हाथ में नहीं आती थी. उदाहरण के लिए बेगम जिन्हें सौ रुपए मिलने चाहिए थे, नकद में सिर्फ सोलह पाती थीं. शेष चौरासी रुपए खाने, कपड़े और निवास की सहूलियत के मद में कट जाते थे. एक चौथी श्रेणी “परी” की भी थी. इन्हें लखनऊ के चौक इलाके की तवायफ़ों के बीच से उनके रूप और नाचने-गाने के हुनर के आधार पर छांटा जाता था. तालीम के बाद वे महफिलों की रौनक बनती थीं. बादशाह का मन आ जाने पर मुताह शादी के जरिए वे बीबी भी बन जाती थीं।

कैसर बेगम ने दिया सुजाक का रोग

बीवियों के सबसे ऊंचे दर्जे महल के लिए बादशाह की औलाद को जन्म देने की शर्त थी. उसके लिए भी तिकड़में चलती थीं. यास्मीन परी और सफराज़ परी ने दावा किया कि वे गर्भवती हैं. उन्हें पर्दे में कर दिया गया. बाद में पता चला कि उन्होंने झूठ बोला था. वे फिर पर्दे के बाहर कर दी गईं और फिर से नाचने-गाने में लग गईं. हूर परी के गर्भवती होने के दावे पर पहले यकीन नहीं किया गया. पांच महीने का गर्भ होने पर जब उसे पर्दे में किया गया तब उसने कहा कि बाहर करो नहीं तो बच्चे को गिरा दूंगी।

समय से पहले सातवें महीने में एक कमजोर लड़के को जन्म दिया, जिसकी जल्दी ही मृत्यु हो गई. कैसर बेगम जिन पर बादशाह न्यौछावर थे, ने बादशाह को सुजाक का रोग दे दिया. उन्होंने “परीख़ाना” में लिखा,” एक गुलाम की तरह दिन-रात उसके पीछे घूमता था. जहां वह सोती-वहां सोता. जहां खाती-साथ खाता था. उसे हजारों रूपये के रुक्के दिए. मरहूम जलालुद्दौला की इमारत दी. लेकिन उसने मुझे डॉक्टर की शरण में पहुंचा दिया।

अफ्रीकन काली बीवियां थीं खूब पसंद

बीवियां चुनने के सवाल पर बादशाह खासे उदार थे. कोई दंभ नहीं. ऊंच-नीच का सवाल नहीं. निचले दर्जे की नौकरानियां हों या गुलाम अफ्रीकन जो भी पसंद आ गई, उससे शादी कर ली. निकाहशुदा बीवियां तक कई मामलों में मददगार साबित होती थीं. बादशाह तो शहर की गलियों में घूमते नहीं थे, इसलिए दरबारी-कारिंदे खोज करते. फिर बादशाह के सामने उन्हें पेश किया जाता.काले रंग की बीवियां वाज़िद अली शाह को काफी पसंद थीं. अफ्रीकन अंगरक्षिकाओं के घेरे में चलना उन्हें भाता था।

1843 में छोटे काले घुंघराले बालों वाली यास्मीन महल से उन्होंने शादी की. उनकी दूसरी अफ्रीकन बीबी का नाम अजीब ख़ानम था. बेगम हज़रत महल जो कि 1857 में अंग्रेजों से बहादुरी के साथ संघर्ष के लिए आज भी याद की जाती हैं, के पिता अम्बर भी अफ्रीकन गुलाम थे. यद्यपि हज़रत महल के नाक-नक्श यास्मीन जैसे विदेशी नहीं थे और वे आकर्षक महिला थीं लेकिन उनका रंग भी काला था।

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