अब बात जेल मैनुअल से जुड़े केस की है दरअसल भारत के जिलों में एक अबोला सा नियम है लिखा नहीं है लेकिन होता यही है कि किसी खास जाति का व्यक्ति ही शौचालय साफ करता है और खास जाति का व्यक्ति खाना बनाता है या किसी खास जाति का व्यक्ति नहीं बना सकता है यह जेल में जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देती हैं इसके खिलाफ आवाज उठाने का फैसला लिया पत्रकार सुकन्या शांता ने उन्होंने दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की और दलील दी कि देश के करीब 13 राज्यों के जेलों में बंद कैदियों के साथ जाति आधारित भेदभाव हो रहा है पत्रकार सुकन्या ने अपनी रिपोर्ट में कुछ राज्यों का उदाहरण दिया उत्तर प्रदेश के जेल मैनुएल 1941 में जाति के आधार पर सफाई संरक्षण और झाड़ू लगाने का काम करने का प्रावधान है केरल में आदतन अपराधी और दोबारा दोषी ठहराए गए अपराधी के बीच अंतर किया जाता है आदतन डकैत या चोर को अलग कैटेगरी में बांटा जाता है बाकी से अलग रखते हैं राजस्थान जेल में कैदी अगर नाई होगा तो उसे बाल और दाढ़ी बनाने का काम मिलेगा वहीं ब्राह्मण कैदी को खाना पकाने का काम मिलता है वाल्मीकि समाज के कैदी सफाई करते हैं
सुकन्या की याचिका पर पहली सुनवाई जनवरी 2024 में हुई बेंच चीफ जस्टिस CJI चंद्रचूड जस्टिस जे वी पर्दी वाला और जस्टिस मनोज मिश्र की थी तब कोर्ट ने याचिका में नामित 13 राज्यों को नोटिस इशू कर दिया था उनसे जवाब तलब किया 6 महीने के अंदर जवाब किस-किस ने दिया केवल उत्तर प्रदेश झारखंड उड़ीसा तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने ही जवाब दिया कोर्ट में सुनवाई जुलाई 2024 में खत्म हुई और सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित किया और आज यानी तीन अक्टूबर को अपना फैसला सुनाने के पहले सीजीआई चंद्र चूर्ण ने याचिकाकर्ता की तारीफ की उन्होंने कहा मैम सुकन्या शांता इतनी साफ वो इस याचिका लिखने के लिए आपका शुक्रिया इससे नागरिकों की शक्ति का पता चलता है
नागरिक बेहतर रिसर्च के साथ आर्टिकल लिखते हैं और मामला हमारी अदालत में आता है इसके बाद अदालत ने अपना फैसला दिया कोर्ट ने कहा जेल मैनुअल के वह प्रावधान जो जाति के आधार पर वर्गीकरण करते हैं संविधान के आर्टिकल 14 15 17 21 और 23 का उल्लंघन करते हैं यानी समानता के अधिकारों का हनन करते हैं जिलों के प्रावधान छुआछूत का ही एक रूप है डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि किसी समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति का इस्तेमाल उस समुदाय के दमन के लिए नहीं किया जाना चाहिए आजादी के 75 साल बाद भी हम जातिगत भेदभाव को खत्म कर पाने में सफल नहीं हो सके हैं कोई भी जाति समूह मैला उठाने सफाई करने निम्न स्तर का काम करने खाना बनाने या खाना ना बनाने के लिए नहीं पैदा होता है यह छुआछूत का वो रूप है जिसे हम इजाजत नहीं दे सकते हैं कैदियों को जाति के आधार पर बांटना जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देता है कैदियों को सम्मान न देना अंग्रेज हुकूमत का प्रतीक है कैदी भी सम्मान प्राप्त करने का अधिकार रखते हैं
उनके साथ भी मानवीय और क्रूरता के बगैर व्यवहार करना चाहिए जेल तंत्र को कैदियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा जेल रजिस्टर में से कैदियों के सामने लिखा जाने वाला जाति का कॉलम हटाना होगा सभी राज्य और देशों को ध्यान में रखते हुए अपने जेल मैनुअल में बदलाव करें इसके अलावा सुनवाई में जाति के बेसिस पर जो भी डिस्क्रिमिनेशन जेलों के अंदर होता था उसको सिरे से हटा दिया गया है सुप्रीम कोर्ट ने सेंटर को निर्देश दिया है कि जो 2016 की जेल मैनुअल थी उसको दोबारा से लाया जाए क्योंकि उसके अंदर बहुत सारी खामियां थी जिसके तहत जेलों में 11 स्टेट्स की जो जेल है वहां पर जाति के आधार पर काम को बांटा जा रहा था जैसे कि अगर किसी की जाति लोअर कास्ट की है
तो उससे सीवर साफ करवाने जैसे काम करवाए जाते थे और कोई उच्च जाति का है तो उससे खाना बनाने का काम करवाया जाता था तो सुप्रीम कोर्ट ने इसको फंडामेंटल राइट्स का हनन बताया है और यह कहा है कि कास्ट के बेस पर ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए और ये निर्देश दिए गए हैं कि जेल में जब कोई भी कैदी जाता है तो एक सेक्शन होता है वहां पे जहां पर जाति के बारे में उनको विवरण देना होता है उस चीज को भी अब सुप्रीम कोर्ट ने उस कॉलम को भी हटाने के लिए रिकमेंडेशन दे दी है
सेंटर को तीन महीने के अंदर ये जेल मैनुअल को चेंज करना होगा और स्टेट्स को भी निर्देश दिए गए हैं कि जैसे ही सेंटर अपने रूल्स चेंज करता है स्टेट्स को भी रूल्स चेंज करने होंगे ये पिटीशन जो है एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग हुई थी उसके बेसिस पर ये पिटीशन दाखिल की गई थी जिसमें ने 11 स्टेट्स की जेल के अंदर यह बताया था कि किस लेवल का डिस्क्रिमिनेशन कैदियों के साथ होता है कैदियों को जाति के आधार पर अलग-अलग रखा जाता था उनसे अलग-अलग तरह के काम कराए जाते थे सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में यह बताया कि यह किसी भी तरह का डिस्क्रिमिनेशन बहुत गलत है 75 साल हो गए हैं आजादी को उसके बाद भी हम सिर्फ कास्ट बेस डिस्क्रिमिनेशन अभी भी झेल रहे हैं जो कि ये होना नहीं चाहिए।

