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उत्तराखण्ड

Uttarakhand Earthquake Zone : सावधान ! उत्तराखंड भूकंप का बड़ा खतरा बना

भूकंप की दृष्टि से उत्तराखंड अतिसंवेदनशील क्षेत्र.

admin
Last updated: 2025/12/02 at 6:05 AM
admin
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6 Min Read
Uttarakhand Earthquake Zone
Uttarakhand Earthquake Zone सावधान ! उत्तराखंड भूकंप का बड़ा खतरा बना
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Highlights
  • जोन छह में शामिल उत्तराखंड.
  • भारतीय मानक ब्यूरो ने नया भूकंपीय क्षेत्रीकरण मानचित्र किया जारी.
  • सेंसर और सायरनों की संख्या बढ़ाई जाएगी.

Uttarakhand Earthquake Zone :  सावधान ! उत्तराखंड भूकंप का बड़ा खतरा बना :-  उत्तराखंड को भूकंप की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र घोषित करते हुए देश के नवीनतम भूकंपीय मानचित्र ने राज्य को सीधे जोन-छह में शामिल कर दिया है। इससे पहले उत्तराखंड को दो हिस्सों में बांटकर एक भाग को जोन चार और दूसरे को जोन पांच में रखा गया था, लेकिन अब भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा जारी रीति संहिता-2025 में पूरे उत्तराखंड सहित सभी हिमालयी राज्यों को सर्वाधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया वर्गीकरण इसलिए भी अहम है क्योंकि हिमालयी भूगर्भीय संरचना, प्लेट सीमाएँ और चट्टानों की संवेदनशीलता पूरे पर्वतीय क्षेत्र में लगभग समान प्रकृति रखती हैं।

Contents
सेंसर और सायरनों की संख्या बढ़ाई जाएगीसंवेदनशील राज्य को सुरक्षित भविष्य देने का यही समय है

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वर्ष 2016 के बाद पहली बार नया भूकंपीय जोनिंग मानचित्र जारी किया गया है और इस बार सभी पहाड़ी राज्यों को एक समान जोखिम वाले क्षेत्र में रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि भूकंप का खतरा चाहे जम्मू-कश्मीर में हो या उत्तराखंड के किसी जिले में—दोनों की संवेदनशीलता अब समान मानी जाएगी। पहले जोन पांच में आने वाले रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ को सर्वाधिक संवेदनशील जिलों में गिना जाता था, जबकि जोन चार में देहरादून, टिहरी, पौड़ी गढ़वाल, हरिद्वार और उत्तरकाशी शामिल थे। अब पूरा राज्य एक ही जोखिम स्तर पर आ गया है। भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के टकराव से लगातार ऊर्जा का संचय होता रहता है, जिसके कारण यह पूरा क्षेत्र भूगर्भीय रूप से अत्यंत सक्रिय बना रहता है।

श्रीनगर गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगर्भ विशेषज्ञ भी यह स्वीकार करते हैं कि हिमालय के भीतर भूगर्भीय संरचना में बड़ा अंतर नहीं होता, क्योंकि यहां की सभी पर्वतीय शृंखलाएँ एक जैसे भू-तत्वों से निर्मित हैं। उनका कहना है कि भूकंप की दर्ज पुरानी घटनाओं, तीव्रता, ऊर्जा प्रवाह और फॉल्ट लाइनों का अध्ययन कर यह नया मानचित्र तैयार किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवेदनशीलता बढ़ने का अर्थ केवल जोखिम बढ़ना नहीं है बल्कि इससे तैयारी और सतर्कता की आवश्यकता का विस्तार भी होता है। उनका मानना है कि इस नई श्रेणीकरण व्यवस्था से निर्माण के मानकों में एकरूपता आएगी और यह पहाड़ी राज्यों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।

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इतिहास का अध्ययन करें तो उत्तराखंड में 1911 से अब तक 6 या उससे अधिक तीव्रता वाले 11 बड़े भूकंप आ चुके हैं, जिनमें से 28 अगस्त 1916 का भूकंप 6.96 तीव्रता के साथ सबसे शक्तिशाली दर्ज किया गया था। एक रोचक तथ्य यह है कि 1975 से 2024 तक के 49 वर्षों में रिक्टर स्केल पर सात या उससे अधिक तीव्रता वाला कोई भी बड़ा भूकंप राज्य में नहीं आया, लेकिन तीन से चार तीव्रता वाले छोटे भूकंपों की संख्या 320 से अधिक दर्ज की गई। यह पैटर्न बताता है कि राज्य में माइक्रो-सीस्मिक गतिविधियाँ लगातार चलती रहती हैं, जो बड़े भूकंप की संभावना को हमेशा बनाए रखती हैं। इन वर्षों में चार से पांच तीव्रता वाले 90 भूकंप, पांच से छह वाले 34 और छह से सात तीव्रता वाले तीन भूकंप भी दर्ज किए गए हैं।

सेंसर और सायरनों की संख्या बढ़ाई जाएगी

राज्य सरकार ने इस बढ़ते जोखिम को देखते हुए सुरक्षा उपायों को मजबूत करने की घोषणा कर दी है। सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी कि मॉक ड्रिल कराई जा चुकी है और अब पूरे राज्य में भूकंप चेतावनी प्रणाली को सशक्त बनाने के लिए सेंसर और सायरनों की संख्या बढ़ाई जाएगी। इसके साथ ही जन-जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाएंगे ताकि लोग भूकंप के दौरान आवश्यक सावधानियों और सुरक्षा प्रोटोकॉल को समझ सकें। यह कदम इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि 2021 में लोकसभा में दिए गए एक उत्तर में अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून और रुड़की को देश के 38 अत्यधिक संवेदनशील शहरों में शामिल किया गया था।

संवेदनशील राज्य को सुरक्षित भविष्य देने का यही समय है

उत्तराखंड में पहले ही जोशीमठ और श्रीनगर जैसे शहरों में असंगठित विकास और गलत प्लानिंग की वजह से घरों में दरारें, जमीन खिसकना और धंसाव जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।अब जब पूरा राज्य सबसे संवेदनशील श्रेणी में आ गया है, तो यह रिपोर्ट शायद सिस्टम की आंखें खोलने का काम करे।उत्तराखंड की नाजुक भू-स्थिति में ऐसे अनियोजित विकास और भारी परियोजनाएं किसी धीमी आपदा से कम नहीं। जरूरत है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन अब भूकंपरोधी निर्माण, सही भू-अध्ययन और जिम्मेदार विकास को प्राथमिकता दे।क्योंकि संवेदनशील पहाड़ों पर गलती की कीमत हमेशा बहुत भारी चुकानी पड़ती है।अगर अब भी सुधार नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

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