GairsainProtest : गैरसैण राजधानी के लिए एक बार फिर आंदोलन शुरू :- एक बार फिर गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग तेज हो रही है। आंदोलनकारी हुंकार भर रहे हैं और सड़कों पर आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं । उत्तराखंड के शहीदों के सपनों की स्थाई राजधानी गैरसैण की स्थापना के संकल्प के साथ ‘स्थाई राजधानी गैरसैण समिति’ ने देहरादून में ऐतिहासिक 20 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा का आयोजन किया । इस आंदोलन में राज्य के वरिष्ठ पूर्व नौकरशाहों, प्रबुद्ध समाजसेवियों, पत्रकारों और युवा पीढ़ी ने शुरुआत से लेकर अंत तक पूरी मजबूती के साथ कदमताल किया। आंदोलनकारियों ने कहा कि राज्य स्थापना के इतने वर्षों बाद भी वर्तमान सरकार जनभावनाओं की अनदेखी कर रही है और पहाड़ों की इस बुनियादी माँग को लेकर पूरी तरह गूँगी और बहरी बनी हुई है, जिसके कारण आम पहाड़ी समाज में भारी निराशा और पीड़ा है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पूर्व आईएएस अधिकारी विनोद प्रसाद रतूड़ी ने सरकार को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा की घोषणा की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि यह 20 किलोमीटर की यात्रा तो केवल एक शुरुआत थी, यदि सरकार ने तत्काल गैरसैण को स्थाई राजधानी घोषित नहीं किया, तो बहुत जल्द देहरादून से लेकर सीधे गैरसैण तक एक विशाल महा-पदयात्रा की शुरुआत की जाएगी। उन्होंने संकल्प लेते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए चाहे आंदोलनकारियों को अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े, वे पीछे नहीं हटेंगे और गैरसैण को उत्तराखंड की स्थाई राजधानी बनाकर ही दम लेंगे।
इस ऐतिहासिक पदयात्रा में समिति के मीडिया प्रभारी युवा आंदोलनकारी और पत्रकारिता छात्रा पार्थ रतूड़ी ने कहा कि सरकार को उत्तराखंड के पहाड़ों की यह असली पीड़ा न तो दिखाई दे रही है और न ही सुनाई दे रही है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि जिन अमर शहीदों ने राज्य निर्माण और गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, आज उनकी आत्माएं भी इस उपेक्षा को देखकर आहत हो रही होंगी। पार्थ ने पहाड़ी समाज से भी आत्ममंथन करने और अपने हकों की रक्षा के लिए बिना किसी देरी के एकजुट होने का पुरजोर आह्वान किया।
इस आंदोलन की गूंज और महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रवासी उत्तराखंडी भी अपनी माटी के इस संघर्ष में शामिल होने के लिए दूर-दूर से पहुँच रहे हैं। समिति के प्रमुख सदस्य अनिल बहुगुणा केवल इस 20 किलोमीटर की पैदल यात्रा में हिस्सा लेने और अपना समर्थन देने के लिए रात भर खुद गाड़ी चलाकर विशेष रूप से दिल्ली से देहरादून पहुँचे और शुरुआत से अंत तक यात्रा में डटे रहे। इस पदयात्रा में पूर्व आईएएस एस. एस. पांगती , प्रकाश थपलियाल, आनंद राम, राकेश ध्यानी, सचिन थपलियाल, सुधीर गैरोला, आरती शर्मा, लक्ष्मी प्रसाद रतूड़ी, जगदीश ममगाईं और राजेंद्र प्रसाद कंडवाल सहित सैकड़ों प्रबुद्ध नागरिकों ने पहाड़ों के वजूद को बचाने के लिए अपनी आवाज बुलंद की।

