बीते दो-ढाई दशकों से भारत और अमेरिका जिस द्विपक्षीय सामरिक साझेदारी को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह राजकीय यात्रा मील का ।
जो बाइडन के पत्थर साबित राष्ट्रपति बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका की राजकीय यात्रा करने वाले तीसरी दुनिया के पहले नेता हैं।
इतना ही नहीं, मोदी उन चंद वैश्विक नेताओं में शुमार हो गए हैं, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को एक से अधिक बार संबोधित किया है।
मगर इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की रीति-नीति को बाइडन भी अब स्वीकार कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा बता रही है कि अमेरिका अब भारत को सिर्फ बाजार नहीं समझता । अमेरिकी नेता यह नहीं सोच रहे कि भारतीय लोकतंत्र का किस तरह अपने हित में इस्तेमाल किया जाए या कैसे नई दिल्ली पर दबाव बनाया जाए, बल्कि वे हमारे प्रधानमंत्री के विचार जानने को उत्सुक थे ।
राष्ट्रपति जो बाइडन समझना चाहते थे कि प्रधानमंत्री मोदी एशिया को लेकर क्या सोचते हैं, उनकी वैश्विक मसलों पर क्या राय है या धार्मिक बहुलवाद और लोकतंत्र को लेकर उनका क्या नजरिया है?
यही वजह है कि व्हाइट हाउस में उनका यूं स्वागत किया गया, और रक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, जेट इंजन, ड्रोन समेत कई मसलों पर आपसी सहमति बनाई गई।
यह साफ संकेत है कि दोनों देशों में आपसी समझ बढ़ी है। अब द्विपक्षीय सहयोग के बुनियादी मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि उभरते तमाम मसलों पर भी दोनों एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं।
यह अच्छी बात है कि मोदी और बाइडन, दोनों नेता प्रौद्योगिकी को आपसी साझेदारी का अहम किरदार मानते हैं।
इस दौरे में अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस और हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच जो समझौता हुआ है, उसके तहत तेजस के लिए जीई एफ 414 इंजन बनाया जाएगा, जिससे स्वाभाविक तौर पर हमारे इस हल्के लड़ाकू विमान की क्षमता बढ़ जाएगी।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत के साथ तकनीक न साझा करने की अमेरिकी नीति अब इतिहास बन चुकी है। भारत दुनिया का पांचवां देश बन गया है, जो यह इंजन बनाएगा ।
सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला और नवाचार संबंधी साझेदारी पर भी दोनों देशों ने सहमति दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया है। इससे कारोबारी अवसरों, शोध कार्यों व कौशल विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।
माइक्रोन टेक्नोलॉजी ने तो भारत में 182.5 करोड़ डॉलर निवेश की घोषणा की भी है, जिसके तहत ‘सेमीकंडक्टर असेंबली’ और ‘टेस्ट फैसिलिटी’ का काम होगा।
इसमें भारत सरकार भी सहयोग देगी। माना जा रहा है कि 2.75 अरब डॉलर मूल्य के इस साझा निवेश से अगले पांच वर्षों में 5,000 सीधी और 15 हजार सामुदायिक नौकरियां पैदा होंगी।
जून के पहले पखवाड़े में भारत आए चैटजीपीटी के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने कहा था कि भारतीय कंपनियां उनके साथ ( चैटजीपीटी) प्रतिस्पधा नहीं कर सकतीं, इसकी कोशिश करना ‘निराशाजनक’ होगा।
इस टिप्पणी का अर्थ था कि भारतीय उतनी कुशलता से काम नहीं कर सकते, जिसकी आज जरूरत है।
अमेरिका के साथ तकनीक हस्तांतरण को लेकर हुआ समझौता इस धारणा को तोड़ने में मददगार हो सकता है। अब यह जिम्मेदारी हमारी है कि हम न सिर्फ उन्नत तकनीक को अपनाएं, बल्कि उनका बेहतर इस्तेमाल भी सुनिश्चित करें।
अमेरिका कभी-कभार ही तकनीक हस्तांतरण में मदद करता है। चीन ने भी कभी इसी तरह अमेरिकी नीति का फायदा उठाया था।
अब यह मौका भारत के पास है। आपसी कारोबारी संबंधों की मजबूती के लिए अमेरिका बेंगलुरू और अहमदाबाद में दो नए वाणिज्य दूतावास खोलने पर भी सहमत हुआ है। भारत भी सिएटल में अपना मिशन स्थापित करेगा ।
वाणिज्य दूतावास का हमें कई तरह से फायदा मिल सकता है। कोई देश अपना वाणिज्य दूतावास तभी स्थापित करता है, जब उसे लगता है कि उस खास जगह पर उसके नागरिक अधिक संख्या में जा रहे हैं।
मुश्किल के वक्त उन्हें तत्काल मदद दी जानी चाहिए, ताकि उनके काम सुगमता से हो सकें। हम दोनों देशों के बीच अर्टेमिस संधि पर बनी रजामंदी भी काफी महत्वपूर्ण है।
भारत ने इस संधि में शामिल होने की स्वीकृति दे दी है। यह असल में समान विचारधारा वाले देशों को अंतरिक्ष खोज के मुद्दे पर एक करता है।
दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां, यानी इसरो और नासा, 2024 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए एक संयुक्त मिशन पर राजी हुई हैं।
हालांकि, यह भी देखना होगा कि दोनों एजेंसियां किस तरह से अपनी योजनाओं को साकार करती हैं। अंतरिक्ष खोज को लेकर हमारी अपनी संकल्पनाएं हैं और अमेरिका की अलग-अलग दोनों योजनाओं में मेल कराना और अंतरिक्ष- खोज को नई दिशा देना काफी महत्वपूर्ण होगा।
मानव युक्त अंतरिक्ष उड़ान के लिए जिस तरह से नासा ने मदद देने का भरोसा दिया है, उससे ठोस उम्मीदें बनती हैं।
स्पष्ट है, भारत अब अमेरिका का, खासकर एशिया में बहुत अहम सहयोगी बन गया है। पहले कभी जी-2 की बात कही जाती थी, तो परमाणु परीक्षण करने पर हम पर बंदिशें लगा दी जाती थीं, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है।
अब नए भारत को स्वीकार किया जा रहा है। अमेरिकी पहल की नई इबारत लिखी जा रही है। एशिया या विश्व की राजनीति में जिस तरह से तीव्र बदलाव हो रहे हैं, उसमें ऐसे रिश्ते काफी मायने रखते हैं।
हालांकि, जी- 20 के अध्यक्ष होने के नाते हमें भी यह देखना होगा कि वैश्विक दक्षिण को लेकर हम क्या रणनीति बना सकते हैं?
चूंकि दोस्ती का हाथ अमेरिका की तरफ बढ़ा है, और वह हमारी नीतियां नहीं बदलना चाहता, बल्कि हमारे साथ मिलकर काम करना चाहता है, इसलिए हमें भी उतनी ही गर्मजोशी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते।

