GujaratiHighCourt : कोर्ट पहुंची प्यार की अनोखी कहानी :- एक बांग्लादेशी युवती जो तस्करी के चंगुल से भागकर अहमदाबाद आई, यहां उसे प्यार मिला, शादी हुई और एक छोटा सा परिवार बना. लेकिन कानून की नजर में वह एक ‘अवैध घुसपैठिया’ है. अब पति ने गुजरात हाई कोर्ट में ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर कर अपनी बांग्लादेशी पत्नी और सात महीने के बच्चे को अदालत के सामने पेश करने की मांग की है।
गुजरात हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के माध्यम से जवाब पेश किया. सरकार ने बताया कि याचिकाकर्ता की पत्नी मूल रूप से बांग्लादेश की नागरिक है. भरूच जिले में दर्ज एक एफआईआर (FIR) की जांच से पता चला है कि यह महिला अन्य महिलाओं के साथ, सीमा पार मानव तस्करी करने वाले एक आरोपी की मदद से अवैध रूप से भारत में घुसी थी।
जांच में यह भी सामने आया कि इन महिलाओं को तस्करी कर सीमा पार लाया गया और फिर भारत के अलग-अलग हिस्सों में रखा गया. याचिकाकर्ता की पत्नी किसी तरह उन आरोपियों के चंगुल से भागने में सफल रही. इसके बाद वह अहमदाबाद के रहने वाले याचिकाकर्ता के संपर्क में आई. बताया गया है कि दोनों में प्यार हुआ, उन्होंने शादी की और उनका एक बच्चा भी है. लेकिन महिला की पहचान और अवैध रूप से भारत में प्रवेश की जांच शुरू होने के बाद, यह पूरा मामला एक कानूनी विवाद में बदल गया।
राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि ‘फॉरेनर्स एक्ट’ (विदेशी अधिनियम), ‘पासपोर्ट एक्ट’ और आप्रवासन से जुड़े अन्य कानूनों के तहत, उस महिला की आवाजाही पर कानूनी पाबंदियां लगाई गई हैं. सरकार का कहना है कि महिला और बच्चे को सरकारी ‘प्रोटेक्शन होम’ (संरक्षण गृह) में रखना पूरी तरह से कानूनी है और इसे किसी भी स्थिति में ‘अवैध हिरासत’ नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा, सरकार ने कहा कि चूंकि इस मामले की जांच अभी चल रही है, इसलिए महिला को कहीं भी आने-जाने की पूरी आजादी देना राष्ट्रीय सुरक्षा और कानूनी प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिहाज से गंभीर खतरा हो सकता है. इसी कारण उनकी आवाजाही पर रोक लगाई गई है. राज्य सरकार के अनुसार, यहां संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार’ का कोई उल्लंघन नहीं हो रहा है, क्योंकि यह पूरी कार्रवाई सख्त कानूनी प्रावधानों के तहत की जा रही है।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील ओम कोटवाल ने अदालत में तर्क दिया कि इस मामले में केवल ‘अवैध घुसपैठ’ के मुद्दे पर ध्यान देना सही नहीं होगा. इसके बजाय, परिवार के मानवीय हितों को देखना भी बहुत जरूरी है- खासकर पति-पत्नी के रिश्ते और सबसे महत्वपूर्ण, उनके सात महीने के बच्चे के भविष्य को. उन्होंने कोर्ट से कहा कि बच्चे को अपनी मां के साथ सरकारी शेल्टर होम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जहां वह अपने परिवार से दूर एक अलग माहौल में बड़ा हो रहा है. बच्चे का स्वास्थ्य, उसका मानसिक विकास और पारिवारिक माहौल भी उतने ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
वकील कोटवाल ने राज्य सरकार के जवाब पर अपनी आपत्ति दर्ज करने के लिए समय मांगा और अदालत से गुहार लगाई कि वे बच्चे से जुड़े मानवीय पहलुओं पर विचार करें. उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मामले में मानवीय पक्ष कानूनी पक्ष जितना ही वजन रखता है. छोटे बच्चे और परिवार से जुड़े मुद्दों में संवेदनशील रवैये की जरूरत होती है. हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई कोर्ट की छुट्टियों के बाद तक के लिए टाल दी है. तब तक महिला और बच्चे की आवाजाही पर लगी पाबंदियां जारी रहेंगी. हालांकि, कोर्ट ने परिवार को उनसे मिलने की अनुमति पहले की तरह ही बरकरार रखी है। खबर मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है।

