ChhinnamastaJayannti2026 : छिन्नमस्ता माता के हाथ में कटा सिर ? अनोखा रहस्य :- हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है, जिनमें माता छिन्नमस्ता को सबसे उग्र और प्रभावशाली माना जाता है. माता का स्वरूप जितना विस्मयकारी है, उनके पीछे की कथा उतनी ही त्याग और करुणा से भरी है. वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को देशभर में मां छिन्नमस्ता की जयंती श्रद्धा के साथ मनाई जाती है. माता छिन्नमस्ता मां पार्वती का उग्र अवतार मानी गई हैं. छिन्नमस्ता दस महाविद्या देवी में से छठी हैं, आइए जानते हैं, आखिर क्यों देवी ने खुद अपना मस्तक काटकर अपनी सहेलियों की भूख शांत की थी और इस साल उनकी जयंती का शुभ मुहूर्त क्या है।
पंचांग के अनुसार, इस साल यह पावन तिथि आज 29 अप्रैल बुधवार की शाम 7:51 बजे से शुरू होकर 30 अप्रैल 2026, गुरुवार को रात 09:12 बजे तक रहेगी. उदया तिथि के अनुसार, छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी।
आखिर देवी ने क्यों काट लिया था अपना सिर ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी पार्वती अपनी सहेलियों (जया और विजया) के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गई थीं. स्नान के बाद उनकी सहेलियां भूख से व्याकुल होने लगीं और उनका रंग काला पड़ गया. उन्होंने देवी से भोजन मांगा. देवी ने कुछ समय प्रतीक्षा करने को कहा, लेकिन जब उनकी भूख असहनीय हो गई, तब करुणावश और अपनी सहेलियों की तृप्ति के लिए देवी ने स्वयं अपना सिर काट लिया।
उनके गले से रक्त की तीन धाराएं निकलीं, दो धाराओं से उनकी सहेलियों जया और विजया की भूख शांत हुई. तीसरी धारा को देवी के कटे हुए सिर ने खुद ग्रहण किया. इसी आत्म-बलिदान और करुणा के कारण उन्हें छिन्नमस्ता जिनका मस्तक कटा हुआ हो कहा जाता है।
माता छिन्नमस्ता की पूजा बहुत ही शक्तिशाली और प्रभावशाली मानी जाती है. वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन से विशेष रूप से पूजन किया जाता है. मान्यता के अनुसार, विधि-विधान से की गई पूजा से जीवन में कई चमत्कारी लाभ मिलते हैं. उनकी पूजा करने से व्यक्ति के अंदर का भय समाप्त हो जाता है और बाहरी नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
जो लोग मानसिक रूप से ख़राब या डरपोक महसूस करते हैं, उनके लिए यह साधना बेहद उपयोगी होती है. माता छिन्नमस्ता का स्वरूप त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक है. उनकी आराधना से व्यक्ति अपने अंदर के क्रोध, लालच और इच्छाओं पर नियंत्रण पा सकता है. उनकी पूजा से मानसिक संतुलन दूर होता है और जीवन में संतुलन, शांति और स्थिरता आती है।

