JournalistMurder : एक बंद कमरा, एक ख़ामोश लाश और वो सच, जो आज भी पूरी तरह सामने नहीं आया :- आज एक ऐसा केस, जिसने न सिर्फ़ एक ज़िंदगी छीनी… बल्कि सिस्टम की चुप्पी पर भी सवाल खड़े कर दिए।एक पत्रकार… एक सुरक्षित मानी जाने वाली कॉलोनी… और एक रात, जिसके बाद सब कुछ बदल गया। एक रिहायशी कॉलोनी… सुबह का वक्त… और एक घर का दरवाज़ा बंद। दरवाज़ा खुलता है… और अंदर मिलता है एक पत्रकार का शव।
एक पत्रकार जो सच बोलता जो सवाल पूछता आज खुद एक सवाल बन चुका हैं शव पर कोई लूट के निशान नहीं… घर में सब कुछ अपनी जगह… तो फिर सवाल उठता है— आख़िर क़ातिल कौन था?
पुलिस जांच आगे बढ़ती है… और धीरे-धीरे साफ़ होता है की यह कोई आम हत्या नहीं थी। कोई ज़बरदस्ती नहीं… कोई बाहरी घुसपैठ नहीं… इसका मतलब साफ़ था— हत्यारा भरोसे का था… और बेहद क़रीबी।
जैसे-जैसे परतें खुलीं, शक की सुई अब सिर्फ़ एक इंसान पर नहीं… बल्कि ताक़त और पद तक पहुँचने लगी। जांच के घेरे में आए— एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, एक निजी परिचित, और एक कथित सुपारी किलर।
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आरोप था कि निजी रिश्तों में बढ़ते तनाव ने एक खौफनाक साज़िश का रूप ले लिया। और उसी साज़िश का अंत एक पत्रकार की मौत से हुआ। मामले की गंभीरता बढ़ी…
दबाव बढ़ा CBI का दावा था— यह हत्या अचानक नहीं… बल्कि पहले से प्लान की गई थी। लेकिन सवाल अब भी बाकी था… सालों तक चली सुनवाई… गवाह… सबूत… और बहसें… निचली अदालत ने
आरोपियों को दोषी माना। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
आज भी सवाल वही हैं— क्या यह पूरा सच था? या सच का कोई हिस्सा अब भी फ़ाइलों में बंद है? और क्या एक पत्रकार को
उसकी आवाज़ की सज़ा मिली?
यह सिर्फ़ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं… बल्कि एक चेतावनी है— कि जब सच ताक़त से टकराता है, तो कभी-कभी कीमत ज़िंदगी होती है। लेकिन सवाल आज भी ज़िंदा है— क्या सच वाकई सामने आ चुका है,
या फिर वो अब भी किसी फाइल में कैद है?”

