SonamWangchukProtest : पिता ने झुकाई थी Indira Gandhi, अब बेटा लड़ रहा है नई लड़ाई! Sonam Wangyal से Sonam Wangchuk तक ;- क्या एक भूख हड़ताल इतिहास बदल सकती है? क्या एक पिता का अधूरा संघर्ष, एक बेटे के संकल्प में बदलकर फिर से पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच सकता है? लद्दाख की बर्फीली वादियों से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक, एक परिवार की कहानी आज फिर सुर्खियों में है।
यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि अधिकार, पहचान और भविष्य की लड़ाई है। आज हम आपको ले चलते हैं उस ऐतिहासिक सफर पर, जहाँ एक पिता ने अपने लोगों के अधिकारों के लिए अनशन किया और आज उनका बेटा उसी आवाज़ को नई ताकत के साथ बुलंद कर रहा है। बात है साल 1984 की, जब लद्दाख के वरिष्ठ नेता और समाजसेवी सोनम वांग्याल ने अपने क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी।
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यह केवल एक राजनीतिक मांग नहीं थी, बल्कि लद्दाख की पहचान, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल था। आंदोलन लगातार मजबूत होता गया और पूरे देश का ध्यान इस ओर खिंचने लगा। कहा जाता है कि बढ़ते जनदबाव के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह पहुँचीं और उन्होंने सोनम वांग्याल को जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया।
इसके साथ ही उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने का भरोसा भी दिया गया। कई वर्षों के संघर्ष के बाद अक्टूबर 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में लद्दाख को आधिकारिक रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला। यह जीत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे लद्दाख की ऐतिहासिक उपलब्धि बन गई।
समय बदला, चेहरे बदले, लेकिन संघर्ष की यह विरासत आज भी जारी है। अब उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक इन दिनों अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनका कहना है कि देश की शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। वह नीट-यूजी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
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28 जून से शुरू हुई इस भूख हड़ताल में सोनम वांगचुक केवल पानी के सहारे उपवास कर रहे हैं, जिसके चलते उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंताएँ भी बढ़ रही हैं। इस आंदोलन को युवा समूह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का समर्थन मिल रहा है। वांगचुक का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ एक परीक्षा या एक फैसले की नहीं, बल्कि उन लाखों छात्रों के भविष्य की है, जो मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं।
हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब सोनम वांगचुक किसी बड़े मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हों। इससे पहले भी वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर लंबे समय तक संघर्ष कर चुके हैं।
एक ओर 1984 में पिता का आंदोलन था, जिसने इतिहास के पन्नों में अपनी अलग पहचान बनाई, तो दूसरी ओर आज बेटे का संघर्ष है, जो नए भारत के सवालों को सामने ला रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा? क्या यह आंदोलन भी किसी बड़े बदलाव की शुरुआत बनेगा? या फिर यह संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई मिसाल बनकर रह जाएगा?

