जी रया ,जागि रया ,
यो दिन बार, भेटने रया,
दुबक जस जड़ हैजो,
पात जस पौल हैजो,
स्यालक जस त्राण है जो,
हिमालय में ह्यू छन तक,
गंगा में पाणी छन तक,
हरेला त्यार मानते रया,
जी रया जागी रया।
HarelaFestival2026 : उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाते हैं ? :- जीते रहो, सजग रहो। तुम्हारी लंबी उम्र हो। इस शुभ दिन पर हर वर्ष भेंट करते रहना। जैसी दूर्वा अपनी मजबूत पकड़ के साथ धरती में फैलती जाती है, वैसे आप भी समृद्ध होना। बेरी के पौधों की तरह आप भी विपरीत परिस्थितियों में फलित और प्रफुल्लित रहना। जब तक हिमालय में बर्फ रहेगी, जब तक गंगा जी मे पानी रहेगा अर्थात अनंत वर्षो तक तुमसे भेंट होती रहे ,ऐसी कामना है।
देवभूमि उत्तराखंड में सावन का आरंभ ‘हरेला पर्व’ के साथ होता है जो कि इस बार 16 जुलाई को मनाया जा रहा है । यह पर्व विशेषत: कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाता है। आइए जानते हैं क्या है हरेला ? और क्यों मनाया जाता है ये त्योहार ?
हरेला पर्व प्रकृति के निकट जाने और उसके प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। इस दिन कुमाऊं क्षेत्र में गाजे-बाजे के साथ नए पौधे लगाये जाते हैं और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प भी लिया जाता है। वैसे, इस त्योहार को कांगड़ा, शिमला और सिरमौर क्षेत्रों में हरियाली या रिहयाली, हिमाचल प्रदेश के जुब्बल और किन्नौर क्षेत्रों में दखरैन के नाम से भी जाना जाता है । पर्व के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि अगर परिवार का कोई सदस्य त्योहार के दिन घर में मौजूद न हो तो उसकी तरफ से बाकायदा हरेला रखा जाता है और जब भी वह घर पहुंचता है तो बड़े-बजुर्ग उसे हरेला से पूजते हैं। कई परिवार इसे अपने परिवार के दूरदराज के सदस्यों को डाक द्वारा भी पहुंचाते हैं। देश-विदेश में बसे लोग चिट्ठियों के लिए जरिए हरेला के तिनकों को आशीष के तौर पर भेजते हैं।
हरेला अच्छी फसल का सूचक होता है । हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल फसलों को किसी दैवीय आपदा से नुकसान न हो । यह भी मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे खेती-बाड़ी में उतना ही फायदा होगा । वैसे तो हरेला हर घर में बोया जाता है लेकिन किसी-किसी गांव में हरेला पर्व को सामूहिक रूप से स्थानीय ग्राम देवता के मंदिर में भी मनाया जाता है। गांव के लोगों द्वारा मिलकर मन्दिर में हरेला बोया जाता है, उसकी देखभाल की जाती है और सभी लोगों द्वारा इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाया जाता है ।
मिट्टी या बांस की बनी जिस टोकरी में अनाज बोते हैं उसे रिंगाल भी कहा जाता है । इसमें अनाज बोने के लिए साफ मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी को पहले सुखाया जाता है और फिर छानकर टोकरी में जमा किया जाता है । इतना ही नहीं इसे इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बच कर रखा जाता है और प्रतिदिन सुबह पानी से सींचा जाता है।
घर वाले इसकी देखरेख 9 दिनों तक करते हैं और 10 वें दिन इसमें उगी फसल को काटा जाता है और देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है । इसी के साथ साल भर के लिए अच्छी फसल की कामना की जाती है । भगवान को चढ़ाने के साथ ही घर के बड़े बुजुर्ग अपने बेटे, नाती-पोतों को हरेला (टोकरी )लगाते हैं । हरेला लगाने का तरीका यह है कि सबसे पहले पैरों , फिर घुटनों , फिर कन्धे और अन्त में सिर पर रखा जाता है और लम्बी उम्र की कामना की जाती है। इस प्रकार हरेला घर में सुख-शांति व समृद्धि का भी प्रतीक है ।

