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Reading: AmbubachiMela2026 : जब मां कामाख्या होती हैं रजस्वला, तब विश्राम करती है धरती मां… जानिए अंबुबाची मेले का रहस्य!”
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khojinarad HIndi News > खोजी नारद ब्रेकिंग न्यूज़ > AmbubachiMela2026 : जब मां कामाख्या होती हैं रजस्वला, तब विश्राम करती है धरती मां… जानिए अंबुबाची मेले का रहस्य!”
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AmbubachiMela2026 : जब मां कामाख्या होती हैं रजस्वला, तब विश्राम करती है धरती मां… जानिए अंबुबाची मेले का रहस्य!”

अंबुबाची मेले का पहला चरण प्रवृत्ति कहलाता है.

Khoji Narad Desk
Last updated: 2026/06/12 at 3:39 PM
Khoji Narad Desk
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Highlights
  • असम के गुवाहाटी स्थित मां कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला वर्ष 2026 में 22 जून की रात से शुरू होगा.
  • अंबुबाची मेले का पहला चरण प्रवृत्ति कहलाता है.
  • मां कामाख्या मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां देवी की पूजा किसी प्रतिमा के रूप में नहीं होती.

 

Contents
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AmbubachiMela2026  : जब मां कामाख्या होती हैं रजस्वला, तब विश्राम करती है धरती मां… जानिए अंबुबाची मेले का रहस्य!” :-  सनातन धर्म में कई ऐसे पर्व हैं जो केवल आस्था ही नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन के गहरे संदेश भी देते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत आयोजन है असम के गुवाहाटी स्थित मां कामाख्या मंदिर का अंबुबाची मेला। मान्यता है कि इन दिनों मां कामाख्या रजस्वला होती हैं और उनके साथ धरती मां भी तीन दिनों तक विश्राम करती हैं। आखिर क्या है इस अनोखी परंपरा का रहस्य और कब से कब तक लगेगा अंबुबाची मेला 2026, देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट।

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नीलांचल पर्वत की पवित्र गोद में बसे मां कामाख्या धाम से हर वर्ष एक ऐसी आस्था की धारा प्रवाहित होती है, जो केवल धर्म तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रकृति, सृजन और नारी शक्ति के सम्मान का संदेश भी देती है। हजारों वर्षों पुरानी मान्यताओं और रहस्यों से जुड़ा अंबुबाची मेला एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। यह वह समय होता है जब मान्यता के अनुसार स्वयं आदिशक्ति मां कामाख्या वार्षिक रजस्वला अवस्था में प्रवेश करती हैं और उनके साथ धरती मां भी तीन दिनों के लिए विश्राम करती हैं। यही कारण है कि इस पर्व को सनातन परंपरा के सबसे अनोखे और रहस्यमयी आयोजनों में गिना जाता है।

असम के गुवाहाटी स्थित मां कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला वर्ष 2026 में 22 जून की रात से शुरू होगा और 26 जून की सुबह संपन्न होगा। इन चार दिनों के दौरान पूरा नीलांचल पर्वत भक्ति, साधना, मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, साधु-संत, तांत्रिक साधक और पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इसी विशाल जनसमूह और आध्यात्मिक महत्व के कारण अंबुबाची मेले को पूर्वोत्तर भारत का महाकुंभ भी कहा जाता है।

अंबुबाची मेले का पहला चरण प्रवृत्ति कहलाता है। इस दौरान मां कामाख्या के गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और 23, 24 तथा 25 जून तक किसी भी श्रद्धालु को दर्शन की अनुमति नहीं होती। मान्यता है कि इन दिनों देवी विश्राम करती हैं और सृष्टि की रचनात्मक शक्ति अपने सर्वोच्च स्वरूप में होती है। इसके बाद 26 जून को निवृत्ति चरण आरंभ होता है। विशेष पूजा, शुद्धिकरण और वैदिक अनुष्ठानों के बाद मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और भक्तों को मां के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है।

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मां कामाख्या मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां देवी की पूजा किसी प्रतिमा के रूप में नहीं होती। गर्भगृह में स्थित प्राकृतिक शिलाखंड को योनि कुंड के रूप में पूजा जाता है, जो सृजन और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अंबुबाची के दौरान इसी पवित्र स्थल को लाल वस्त्र से ढक दिया जाता है। मान्यता है कि तीन दिनों के बाद यह वस्त्र और पवित्र जल देवी की शक्ति का प्रतीक बन जाते हैं। कपाट खुलने के बाद श्रद्धालुओं को अंगोदक और अंगवस्त्र प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं, जिन्हें मां कामाख्या के विशेष आशीर्वाद का स्वरूप माना जाता है। |

बुबाची मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और नारी सम्मान का जीवंत संदेश भी है। यह पर्व हमें बताता है कि सृजन की शक्ति का सम्मान ही जीवन का आधार है। जब मां कामाख्या विश्राम करती हैं, तब धरती भी नई ऊर्जा संचित करती है और फिर शुरू होता है जीवन, हरियाली और नई उम्मीदों का एक नया चक्र। आस्था, अध्यात्म और प्रकृति के इसी अद्भुत संगम का नाम है अंबुबाची मेला।

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