TopperStory : देश के टॉपर ने लिया दिल जीतने वाला फैसला :- करियर से बड़ा रिश्ता: महारूफ-मसरूर की प्रेरणादायक कहानीहर साल लाखों छात्र भारत में आईआईटी में प्रवेश पाने का सपना देखते हैं। खासकर IIT बॉम्बे जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में कंप्यूटर साइंस की सीट पाना हर छात्र की बड़ी उपलब्धि होती है। लेकिन जुड़वां भाई महारूफ और मसरूर खान की कहानी इस सामान्य परिदृश्य से हटकर कुछ अलग है, जो सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि रिश्तों की गहराई की मिसाल बन गई है।
बड़ी अपडेट एक क्लिक में :- CharDhamYatra2026 : चार धाम का रहस्य: मोक्ष, आस्था और दिव्य ऊर्जा की खोज
महारूफ और मसरूर ने जेईई एडवांस्ड 2026 में बेहतरीन प्रदर्शन किया। महारूफ ने ऑल इंडिया रैंक 32 हासिल की, जबकि मसरूर ने भी रैंक 169 के साथ कमाल किया। महारूफ के लिए IIT बॉम्बे में कंप्यूटर साइंस की सीट लगभग सुनिश्चित थी, वहीं मसरूर के लिए वही सीट पाना चुनौतीपूर्ण था।
आमतौर पर ऐसी स्थिति में छात्र अपने करियर को प्राथमिकता देते हैं और अलग-अलग संस्थानों में दाखिला लेते हैं। लेकिन महारूफ ने अपने भाई के साथ रहने और साथ पढ़ाई करने का फैसला किया।महारूफ ने IIT बॉम्बे की सीट छोड़ दी और अपनी काउंसलिंग प्राथमिकताओं में बदलाव किया ताकि दोनों भाई एक ही संस्थान में पढ़ सकें।
दोनों ने IIT मद्रास में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई शुरू की। यह कदम सिर्फ एक कॉलेज बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि दोनों के बीच गहरे भाईचारे और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का प्रतीक था।इस सफलता की कहानी में उनके परिवार की भूमिका भी अहम रही। उनके पिता डॉ. मंसूर अहमद खान, जो एक चिकित्सक हैं, व्यस्तता के बावजूद अपने बेटों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे।
उनकी मां ने पढ़ाई और दिनचर्या का पूरा ध्यान रखा। परिवार का यह सहयोग और त्याग दोनों भाइयों के लिए मजबूत आधार बना।कोटा में तैयारी के दौरान भी दोनों भाइयों की दिनचर्या समान थी। वे साथ कोचिंग जाते, घंटों पढ़ाई करते, और एक-दूसरे की मदद करते। पढ़ाई के तनाव को कम करने के लिए वे बैडमिंटन खेलते और मोबाइल फोन का उपयोग केवल आवश्यक जानकारी के लिए करते थे।
दोनों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा थी, लेकिन इससे ज्यादा एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की भावना थी।महारूफ-मसरूर की कहानी हमें यह सिखाती है कि असली सफलता केवल रैंक या प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश नहीं होती। यह उन मूल्यों में होती है जो इंसान को बेहतर बनाते हैं—सपोर्ट, प्यार, और साथ।
बड़ी अपडेट एक क्लिक में :- DhariDeviStory : Dhari Devi कटी हुई प्रतिमा से जागृत शक्ति बनने तक की रहस्यमयी कथा
आज के प्रतिस्पर्धात्मक दौर में जब कई लोग सिर्फ उपलब्धियों पर ध्यान देते हैं, तब इन भाइयों ने साबित किया कि रिश्तों की कीमत सबसे ऊपर होती है।महारूफ का IIT बॉम्बे की सीट छोड़ना कई लोगों को चौंका सकता है, लेकिन उनके लिए यह त्याग नहीं था।
उनके लिए सबसे बड़ी खुशी अपने भाई के साथ आगे बढ़ना और साथ की ताकत से मंजिल पाना था। उनकी यह कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बनी है, क्योंकि यह दिखाती है कि कुछ रिश्ते किसी भी बड़ी उपलब्धि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
इस तरह, महारूफ और मसरूर ने हम सभी को याद दिलाया कि करियर से बड़ा भी कोई रिश्ता हो सकता है, और वह है भाईचारे का रिश्ता। उनके इस फैसले ने न केवल उन्हें बल्कि हम सबको जीवन के सही मायने समझाए हैं।

