ShivDhanush : शिव के धनुष से कितना अलग था श्रीराम का धनुष ? :- रामायण के युद्धों और प्रसंगों में भगवान श्रीराम की वीरता के कई वर्णन मिलते हैं, लेकिन उनके जिस शस्त्र ने अधर्म का नाश किया, वह था उनका अद्वितीय धनुष- ‘कोदंड’. बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीराम को कोदंड के नाम से भी संबोधित किया जाता था, क्योंकि वे इस चमत्कारी धनुष को धारण करने वाले एकमात्र योद्धा थे. अधिकांश लोग इस बात को जानना चाहते हैं, आखिर भगवान श्रीराम का धनुष शिव जी के धनुष से कितना अलग था. साथ ही भगवान श्रीराम का कितना शक्तिशाली था और उन्हें यह धनु किसने दिया था. अगर आप भी अब तक प्रभु श्रीराम के धनुष के धनुष की खासियतों के बारे में नहीं जानते हैं, तो अभी जान लीजिए।
‘कोदंड’ का अर्थ है- बांस से बना हुआ. यह कोई साधारण धनुष नहीं था. इसकी बनावट और शक्ति अत्यंत दुर्लभ थी. कोदंड की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इससे छूटा हुआ बाण अपने लक्ष्य को भेदने के बाद ही वापस तरकश में लौटता था. इसे धारण करना हर किसी के वश की बात नहीं थी. गोस्वामी तुलसीदास जी ‘रामचरितमानस’ में लिखते हैं- “देखि राम रिपु दल चलि आवा। बिहसी कठिन कोदण्ड चढ़ावा” अर्थात् जब भी शत्रु सेना को निकट आते देखते, प्रभु श्रीराम मंद मुस्कान के साथ अपने कठिन यानी अत्यंत शक्तिशाली कोदंड पर प्रत्यंचा चढ़ा देते थे।
प्रभु श्रीराम के कोदंड और उनके बाणों की शक्ति का एक जीवंत उदाहरण जयंत के प्रसंग में मिलता है. इंद्र पुत्र जयंत ने प्रभु की शक्ति की परीक्षा लेने के लिए कौवे का रूप धारण किया और माता सीता के चरणों में चोंच मारकर उन्हें घायल कर दिया. जब रघुनाथ जी ने माता के चरणों से रक्त बहता देखा, तो उन्होंने एक साधारण सींक को ही कोदंड की शक्ति से अभिमंत्रित कर दिया।
वह बाण जयंत के पीछे लग गया. जयंत अपनी रक्षा के लिए पिता इंद्र और समस्त देवताओं के पास गया, लेकिन श्रीराम के द्रोही को किसी ने शरण नहीं दी. आखिरकार नारद जी की सलाह पर वह प्रभु के चरणों में ही गिरा और अपनी रक्षा की गुहार लगाई.एक अन्य प्रसंग में, जब लंका जाने के लिए समुद्र ने मार्ग देने से इनकार कर दिया, तब श्रीराम ने क्रोधवश कोदंड पर बाण चढ़ाया. उस बाण की तपन इतनी थी कि समुद्र सूखने लगा. तब वरुण देव (जल के देवता) खुद प्रकट हुए और प्रार्थना कर नल-नील के माध्यम से मार्ग का समाधान बताया।

