UttarakhandGhostVillage : जहां उम्मीद लौटे, वहां गांव फिर से बसते हैं :- उत्तराखंड में भूतिया गांवों की कहानी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। पलायन, रोजगार की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने प्रदेश के सैकड़ों गांवों को खाली कर दिया। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार राज्य में करीब 1700 गांव ऐसे हैं, जिन्हें लोग छोड़ चुके हैं और समय के साथ उन्हें “भूतिया गांव” कहा जाने लगा। लेकिन पिथौरागढ़ जिले का मटियाल गांव इस सोच को बदलने वाली एक प्रेरणादायक मिसाल बनकर सामने आया है, जहां दो युवाओं की जिद और मेहनत ने एक सूने गांव में फिर से जीवन लौटा दिया।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पलायन की समस्या नई नहीं है। रोजगार के अवसरों की कमी, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं के अभाव ने लोगों को शहरों की ओर जाने के लिए मजबूर किया। कई जगहों पर अंधविश्वास और अफवाहों ने भी गांवों को खाली कराने में भूमिका निभाई। चंपावत जिले के स्वाला गांव की कहानी इसका उदाहरण है, जहां 1952 में हुई एक दुर्घटना के बाद फैली अफवाहों ने लोगों के मन में डर पैदा कर दिया और धीरे-धीरे गांव खाली हो गया। इसी तरह कई गांवों में लोगों के जाने के बाद जमीन बंजर होती गई और गांव वीरान हो गए।
ऐसा ही एक गांव था पिथौरागढ़ का मटियाल। करीब दो दशक पहले तक यहां लगभग 20 परिवार रहते थे। लोग खेती-बाड़ी करते थे और गांव में जीवन सामान्य था। लेकिन समय के साथ रोजगार की कमी और सुविधाओं के अभाव ने लोगों को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। सड़क और अन्य सुविधाएं पास के गांवों तक पहुंचीं तो बचे हुए परिवार भी वहां बस गए। पांच साल पहले गांव का आखिरी परिवार भी यहां से चला गया और मटियाल को भूतिया गांव कहा जाने लगा।
साल 2020 में कोविड लॉकडाउन के दौरान इस गांव की किस्मत बदलनी शुरू हुई। मुंबई में एक रेस्तरां में काम करने वाले विक्रम सिंह मेहता और पानीपत में ड्राइवर का काम करने वाले दिनेश सिंह अपने गांव लौटे। गांव की वीरानी देखकर उन्होंने यहां से फिर पलायन करने के बजाय यहीं बसने का फैसला किया। लोगों ने उन्हें समझाया, भूतिया गांव की कहानियां सुनाईं, लेकिन दोनों ने हालात बदलने की ठान ली। उनका मानना था कि गांव में पानी और उपजाऊ जमीन है, बस मेहनत और सही दिशा की जरूरत है।
दोनों युवाओं ने अनाज और सब्जियों की खेती से शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत करीब डेढ़ लाख रुपये का ऋण लिया। मेहनत रंग लाई और खेती से मुनाफा मिलने लगा। इसके बाद उन्होंने पशुपालन शुरू किया और गाय, बैल व बकरियां खरीदीं। धीरे-धीरे गांव में फिर से गतिविधियां शुरू होने लगीं। खाली पड़ी जमीन पर फसलें लहलहाने लगीं और गांव की पहचान बदलने लगी।
विक्रम सिंह मेहता बताते हैं कि गांव से उनका भावनात्मक जुड़ाव था। बचपन की यादें और यहां की उपजाऊ जमीन ने उन्हें वापस लौटने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि अगर गांव में रोजगार के साधन तैयार किए जाएं तो लोग वापस लौट सकते हैं। उनकी मेहनत को देखकर अब अन्य परिवारों का भी भरोसा लौट रहा है और कुछ परिवार फिर से मटियाल गांव में बसने लगे हैं।
राज्य सरकार भी पलायन रोकने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रयास कर रही है। बागवानी विभाग के सहायक विकास अधिकारी गौरव पंत के अनुसार, मटियाल गांव को एंटी-माइग्रेशन योजना के तहत सुविधाएं दी गईं। सरकार का उद्देश्य है कि पलायन प्रभावित गांवों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर विकसित किए जाएं, ताकि लोग अपने गांव में रहकर ही आजीविका कमा सकें।
आज मटियाल गांव सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि उम्मीद और बदलाव की कहानी बन चुका है। दो युवाओं की मेहनत ने यह साबित कर दिया कि अगर संकल्प मजबूत हो तो भूतिया कहलाने वाला गांव भी फिर से बस सकता है। मटियाल की यह कहानी उत्तराखंड के अन्य खाली हो चुके गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रही है, जहां लोग अब पलायन के बजाय अपने गांव लौटकर नई शुरुआत करने का सपना देख रहे हैं।

