इंसाफ के इंतज़ार में टूटी एक ज़िंदगी :- मणिपुर की मई 2023 की जातीय हिंसा से जुड़ा एक बेहद दर्दनाक और संवेदनशील मामला एक बार फिर सामने आया है। कुकी-जो समुदाय की 20 साल की एक युवती, जिसने उस हिंसा के दौरान अपने अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया था, गुवाहाटी के एक अस्पताल में इलाज के दौरान uska निधन हो गया। युवती पिछले ढाई साल से गंभीर शारीरिक चोटों और गहरे मानसिक आघात से जूझ रही थी।
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यह घटना 15 मई 2023 की है। मणिपुर में जातीय हिंसा अपने चरम पर थी। इसी दौरान इंफाल के न्यू चेकॉन इलाके में एक एटीएम के पास से इस युवती का अपहरण कर लिया गया। आरोप है कि उसे एक सशस्त्र समूह के हवाले कर दिया गया, जहां तीन लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद उसे एक नाले में फेंक दिया गया।
गंभीर हालत में एक ऑटो चालक ने युवती को देखा और इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया। उस समय युवती की उम्र महज 18 साल थी। पीड़िता ने जुलाई 2023 में कांगपोकपी पुलिस को शिकायत दी, जिसके बाद इंफाल ईस्ट के पोरोम्पत थाने में FIR दर्ज हुई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि ढाई साल बीत जाने के बाद भी न तो किसी आरोपी की पहचान हो पाई और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई।
इस दौरान युवती ने मणिपुर, नागालैंड और असम के कई अस्पतालों में इलाज कराया। गंभीर शारीरिक चोटों के साथ-साथ वह लगातार मानसिक तनाव, सांस लेने में दिक्कत, नींद न आने और गहरे सदमे से जूझती रही। गर्भाशय से जुड़ी गंभीर समस्याओं के चलते उसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
आखिरकार 10 जनवरी 2026 को गुवाहाटी के एक अस्पताल में इलाज के दौरान युवती ने दम तोड़ दिया। परिजनों का कहना है कि वह इंसाफ की उम्मीद में आखिरी सांस तक संघर्ष करती रही। मणिपुर में मई 2023 से मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय संघर्ष जारी है। इस हिंसा में अब तक 260 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और 60 हजार से अधिक लोग अपने घरों से बेघर हो चुके हैं। हजारों घर, चर्च और मंदिर जला दिए गए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं, लेकिन ज्यादातर मामलों में अब तक न्याय नहीं मिल पाया है।
इस मामले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिंसा की शिकार महिलाओं को समय पर न्याय मिल पाता है? क्या कानून की धीमी रफ्तार ने एक और ज़िंदगी छीन ली?
मणिपुर में फिलहाल राष्ट्रपति शासन लागू है, लेकिन कुकी-जो युवती की मौत ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ शासन बदलने से नहीं, बल्कि तेज और निष्पक्ष न्याय से ही भरोसा लौट सकता है। यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है।
यह कहानी है उन सभी आवाज़ों की, जो इंसाफ मांगते-मांगते खामोश कर दी गईं। एक बेटी चली गई… लेकिन सवाल अब भी जिंदा हैं।

