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LohriFestival2026 : लोहड़ी पर्व की अनसुनी कहानी

दुल्ला भट्टी ने उन दोनों लड़कियों को अपने घर में सुरक्षित रखा। उसने पूरे गाँव को बुलाया और उनकी इज़्ज़त के साथ शादी करवाई.

admin
Last updated: 2026/01/14 at 10:43 AM
admin
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5 Min Read
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Highlights
  • गाँव वालों ने दुल्ला भट्टी की बहुत तारीफ़ की। तभी से लोग उसे गरीबों का मसीहा कहने लगे.
  • दुल्ला भट्टी हमें सिखाता है कि सच्ची बहादुरी दूसरों की मदद करने में होती है और कमजोर लोगों की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म.
  • लोहड़ी का त्योहार सर्दियों के मौसम में आता है, जब ठंड अपने चरम पर होती है.

LohriFestival2026 :  लोहड़ी पर्व की अनसुनी कहानी :- आज हम आपको उत्तर भारत के एक प्रमुख और लोकप्रिय त्योहार लोहड़ी के बारे में बताएंगे। लोहड़ी का त्योहार हर साल 13 जनवरी को मनाया जाता है। यह त्योहार खास तौर पर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ इलाकों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोहड़ी को फसल और खुशहाली का पर्व माना जाता है।

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बहुत समय पहले पंजाब में दुल्ला भट्टी नाम का एक बहादुर और नेक दिल इंसान रहता था। वह अमीरों से नहीं, बल्कि गरीबों और बेसहारा लोगों की मदद करता था। लोग उसे अपना रक्षक मानते थे।

उस समय कुछ ज़ालिम ज़मींदार और शासक गरीब लड़कियों को परेशान करते थे। वे उनकी शादी में मदद नहीं करते थे और उनसे ज़बरदस्ती पैसा माँगते थे। दुल्ला भट्टी को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं था। वह ऐसे लोगों के खिलाफ खड़ा होता था।

एक बार गाँव में सुंदरी और मुंदरी नाम की दो गरीब लड़कियाँ रहती थीं। उनके माता-पिता नहीं थे और कोई उनकी शादी कराने वाला नहीं था। ज़ालिम लोग उन्हें बेचने की कोशिश कर रहे थे। जब दुल्ला भट्टी को यह बात पता चली, तो वह बहुत गुस्से में आ गया।

दुल्ला भट्टी ने उन दोनों लड़कियों को अपने घर में सुरक्षित रखा। उसने पूरे गाँव को बुलाया और उनकी इज़्ज़त के साथ शादी करवाई। दुल्ला भट्टी ने खुद उनकी शादी में भाई की तरह कन्यादान किया। उसने लड़कियों को कपड़े, गहने और ज़रूरी सामान दिया।

गाँव वालों ने दुल्ला भट्टी की बहुत तारीफ़ की। तभी से लोग उसे गरीबों का मसीहा कहने लगे। उसकी बहादुरी और अच्छाई की कहानियाँ दूर-दूर तक फैल गईं।

कहा जाता है कि लोहड़ी के त्योहार पर लोग आज भी दुल्ला भट्टी को याद करते हैं। लोहड़ी के गीतों में उसका नाम लिया जाता है और उसकी अच्छाई को सम्मान दिया जाता है।

दुल्ला भट्टी हमें सिखाता है कि सच्ची बहादुरी दूसरों की मदद करने में होती है और कमजोर लोगों की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है। यही कारण है कि आज भी दुल्ला भट्टी का नाम इज़्ज़त और सम्मान के साथ लिया जाता है।

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लोहड़ी का त्योहार सर्दियों के मौसम में आता है, जब ठंड अपने चरम पर होती है। इस दिन लोग ठंड से राहत पाने और अच्छी फसल के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। लोहड़ी खास तौर पर रबी की फसल से जुड़ी होती है। किसान इस दिन अच्छी पैदावार की खुशी मनाते हैं और आने वाले समय के लिए अच्छी फसल की कामना करते हैं।

लोहड़ी की शाम को लोग अपने घरों के बाहर या खुले मैदान में अलाव जलाते हैं। अलाव के चारों ओर परिवार और पड़ोसी इकट्ठा होते हैं। लोग अलाव में रेवड़ी, मूंगफली, मक्का, तिल और गुड़ डालते हैं। इसे अग्नि को अर्पित करना माना जाता है। इसके साथ ही लोग अलाव की परिक्रमा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

लोहड़ी के मौके पर लोकगीत और भांगड़ा-गिद्धा भी खास आकर्षण होते हैं। पुरुष भांगड़ा करते हैं और महिलाएं गिद्धा नृत्य करती हैं। ढोल की थाप पर पूरा माहौल खुशी से भर जाता है। लोग पारंपरिक कपड़े पहनते हैं और एक-दूसरे को लोहड़ी की शुभकामनाएं देते हैं।

लोहड़ी का त्योहार उन परिवारों के लिए और भी खास होता है, जिनके घर में नवविवाहित जोड़ा या नवजात बच्चा होता है। ऐसे घरों में लोहड़ी बड़े स्तर पर मनाई जाती है। रिश्तेदार और पड़ोसी मिठाइयां और उपहार लेकर आते हैं।

इस त्योहार का एक ऐतिहासिक महत्व भी है। कहा जाता है कि लोहड़ी का संबंध दुल्ला भट्टी से है, जो गरीबों की मदद करता था। लोग आज भी लोहड़ी के गीतों में दुल्ला भट्टी को याद करते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

लोहड़ी न सिर्फ एक त्योहार है, बल्कि यह एकता, भाईचारे और खुशियों का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें अपनी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ने का संदेश देता है। बदलते समय के साथ लोहड़ी मनाने के तरीके बदल रहे हैं, लेकिन इसकी भावना आज भी वही है।

तो यह था लोहड़ी पर्व पर हमारा खास समाचार पैकेज।

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