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khojinarad HIndi News > उत्तराखण्ड > SelkuMelaUttarkashi : उत्तरकाशी में सेल्कू मेला क्यों मनाते हैं ?
उत्तरकाशी

SelkuMelaUttarkashi : उत्तरकाशी में सेल्कू मेला क्यों मनाते हैं ?

प्रकृति को धन्यवाद देने का दिन हैं.

admin
Last updated: 2026/09/21 at 11:12 AM
admin
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4 Min Read
SelkuMelaUttarkashi
SelkuMelaUttarkashi : उत्तरकाशी में सेल्कू मेला क्यों मनाते हैं ?
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Highlights
  • सेल्कू मेला कैसे मनाया जाता है?
  • सेल्कू मेले का महत्व.
  • सोमेश्वर देवता की डोली, पांडव परंपराएं, लोकनृत्य और गांव की बेटियों की घर वापसी इस उत्सव को और भी खास बना देती है.

SelkuMelaUttarkashi : उत्तरकाशी में सेल्कू मेला क्यों मनाते हैं ? :-  उत्तराखंड की अनोखी लोकपरंपराओं में सेल्कू मेला प्रकृति, आस्था और सामुदायिक संस्कृति का अद्भुत संगम है। सेल्कू यानी “कौन सोएगा?” -और इसी भावना के साथ ग्रामीण पूरी रात लोकगीत, रासो-तांडी और पारंपरिक उत्सव में शामिल होते हैं। यह पर्व मानसून की हरियाली को विदाई और बुग्यालों में खिले ब्रह्मकमल सहित हिमालयी फूलों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी है। ग्रामीण इन फूलों को एकत्र कर स्थानीय देवताओं को अर्पित करते हैं और प्रकृति के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं।

Contents
प्रकृति को धन्यवाद देने का दिन हैंसेल्कू मेला कैसे मनाया जाता है?सेल्कू मेले का महत्व

प्रकृति को धन्यवाद देने का दिन हैं

सोमेश्वर देवता की डोली, पांडव परंपराएं, लोकनृत्य और गांव की बेटियों की घर वापसी इस उत्सव को और भी खास बना देती है। सेल्कू सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उस जीवंत संस्कृति की पहचान है, जहाँ प्रकृति, देवता और समाज एक साथ उत्सव मनाते हैं। उत्तराखंड के लोग मकर संक्रांति के अवसर पर प्रतिवर्ष सेल्कू मेला मनाते हैं। यह मेला उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के भाटवाड़ी के रायथल गांव में मनाया जाता है। मुखबा, घोरसाली, धराली, गंगोत्री और बूढ़ा केदार क्षेत्र में यह त्योहार आमतौर पर सितंबर के महीने में भाद्रपद मास (हिंदू कैलेंडर के अनुसार) में मनाया जाता है।

सेल्कू मेला कैसे मनाया जाता है?

मेले के दौरान राज्य के फूल ‘ब्रह्मकमल’ का अर्पण करना अत्यंत शुभ माना जाता है। बड़ी संख्या में लोग सोमेश्वर मंदिर में यह फूल तोड़कर अर्पित करते हैं। भक्त अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं। उत्तरकाशी से कंदार देवता और खरासली मंदिर से सोमेश्वर देवता, माता जगदंबा जैसी अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को भी सजी हुई पालकियों में लाया जाता है।

हर्षिल, खरासली, मुखबा, झाला, सौर, लता, घोरसली, जसपुर, भीलंग बसई और धराली जैसे आसपास के गांवों के लोग भी इस मेले में पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं। सेल्कू मेला ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। इस मेले के माध्यम से स्थानीय लोग पूरे वर्ष, विशेष रूप से मानसून के दौरान, उन्हें सुरक्षित और स्वस्थ रखने के लिए भगवान का धन्यवाद करते हैं। स्थानीय लोग इस जीवंत मेले को मनाकर मानसून को विदाई देते हैं।

सेल्कू मेले का महत्व

सेल्कू का शाब्दिक अर्थ है ‘सोएगा कौन’ (कौन सोएगा)। यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, जिसमें पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियाँ होती हैं और कोई भी नहीं सोता। श्रद्धालु मेले के रंगीन वातावरण में खो जाते हैं। ‘रासो’ और ‘तांडी’ जैसे लोकप्रिय नृत्यों में लोग पालकी के चारों ओर गोलाकार नृत्य करते हैं। ऐसा माना जाता है कि सेल्कू मेले के आयोजन का कारण तिब्बती व्यापार से जुड़ा है।

पुराने समय में, व्यापार करने वाले लोग नमक और आटा खरीदने के लिए तिब्बत जाया करते थे। तिब्बत से लोग यहाँ कोदो का आटा खरीदने आते थे। व्यापारियों की सुरक्षित वापसी और व्यापार की समृद्धि के लिए लोग रामेश्वर देवता के दर्शन करने और प्रार्थना करने के लिए आते थे। वे पूरी रात जागते थे और स्थानीय गायकों की धुन पर नाचते थे। आज भी यह मेला लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण और पूजनीय है।

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