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Reading: 13 महीने वाला कैलेंडर
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13 महीने वाला कैलेंडर

नए साल में 13 महीने का हिंदू कैलेंडर, 19 साल बाद बड़े त्योहारों में आएगा इतना अंतर .

admin
Last updated: 2025/06/23 at 9:51 AM
admin
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6 Min Read
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Highlights
  • हम सभी सितंबर को साल का नौवां महीना मानते हैं, लेकिन सितंबर का नाम लैटिन शब्द ‘Septem’ से आया.
  • हमें इतिहास की इस साजिश को समझकर विज्ञान और प्रकृति के करीब आने वाले कैलेंडर की तरफ भी ध्यान देना चाहिए.
  • हमारा कैलेंडर असल में 13 महीनों वाला था और कैसे सत्ता, राजनीति और धर्म ने इसे बदला.
  • कैलेंडर लगभग 7-8 साल हमारे ग्रेगोरियन कैलेंडर से पीछे है.

13 महीने वाला कैलेंडर :  आज हम एक ऐसा गहरा रहस्य लेकर आए हैं, जो शायद आपने कभी सुना न हो। क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे रोज़मर्रा के कैलेंडर में छुपा हुआ एक बड़ा राज़ है? जी हाँ, जो कैलेंडर हम इस्तेमाल करते हैं, वह वास्तव में एक राजनीतिक और ऐतिहासिक साजिश की वजह से बदला गया है। आज हम जानेंगे 13 महीने वाले कैलेंडर का असली सच, उसके पीछे छुपी हुई वजहें, और क्यों इसे हमसे छुपाया गया।

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पहले ज़माने में, जो कैलेंडर प्रचलित था, वह 13 महीनों वाला था। हर महीना लगभग 28 दिनों का होता था, जो चंद्रमा के चक्र के अनुसार चलता था। यह कैलेंडर प्रकृति और विज्ञान के लिहाज से बहुत सटीक था। चंद्र कैलेंडर के इस सिस्टम में महीनों की गिनती और दिन की संख्या प्रकृति के साथ तालमेल रखती थी। लेकिन बाद में, सत्ता संघर्ष, राजनीति और धार्मिक कारणों से 12 महीनों वाला ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू कर दिया गया। यही वह कैलेंडर है जो आज हम इस्तेमाल करते हैं।

इसके कारण कई महीनों के नाम और क्रम में गड़बड़ी हुई, जो आज भी हमारी सोच में भ्रम पैदा करती है। हम सभी सितंबर को साल का नौवां महीना मानते हैं, लेकिन सितंबर का नाम लैटिन शब्द ‘Septem’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘सात’। इसी तरह, अक्टूबर का नाम ‘Octo’ से आया है, जिसका मतलब ‘आठ’ होता है। इसका मतलब यह है कि कभी सितंबर सातवां और अक्टूबर आठवां महीना थे, लेकिन अब यह नौवां और दसवां क्यों हैं? इसका जवाब हमें जूलियस सीज़र और ऑगस्टस सीज़र की कहानी में मिलता है। जुलाई और अगस्त महीनों के नाम इन दो रोमन सम्राटों के सम्मान में रखे गए थे। जुलाई, जूलियस सीज़र के नाम पर और अगस्त, ऑगस्टस सीज़र के नाम पर। इस सम्मान में इन महीनों को अधिक दिन दिए गए, जिससे बाकी महीनों का क्रम और उनकी संख्या प्रभावित हुई और गड़बड़ी हो गई।

असल में 13 महीने वाला कैलेंडर न केवल विज्ञान के हिसाब से सही था, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी प्राचीन समाजों के लिए महत्वपूर्ण था। परंतु, सत्ता के लोगों ने समय की गणना को अपने फायदे के लिए बदला। उन्होंने कैलेंडर में बदलाव कर इतिहास को इस तरह मोड़ा कि उनके शासनकाल और शक्तियों को अधिक मान्यता मिले। इसलिए, ये सच्चाई और इस कैलेंडर के अस्तित्व को जनता से छुपाया गया। क्या आप जानते हैं कि आज भी एक देश ऐसा है जो 13 महीने वाले कैलेंडर को मानता है? वह देश है इथियोपिया।

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यहाँ का कैलेंडर लगभग 7-8 साल हमारे ग्रेगोरियन कैलेंडर से पीछे है। इथियोपियाई कैलेंडर में साल में 13 महीने होते हैं, जिसमें 12 महीने 30 दिन के और आखिरी महीने में 5 या लीप ईयर में 6 दिन होते हैं। इथियोपिया का यह कैलेंडर रोमन चर्च के 525 ईस्वी में संशोधित कैलेंडर पर आधारित है, जो आज भी यहाँ प्रचलित है। इस वजह से इथियोपिया अपनी अलग समय गणना और तारीख रखता है। जब पूरी दुनिया COVID-19 महामारी से जूझ रही थी और साल 2020 में थी, तब इथियोपिया में साल 2012 था। इतिहास में समय की गणना को बदलना कोई साधारण बात नहीं थी। इसके पीछे कई राजनीतिक और धार्मिक कारण थे। सत्ता में बैठे लोगों ने अपनी सत्ता और नियंत्रण बनाए रखने के लिए समय के इस प्राकृतिक और वैज्ञानिक पैमाने को तोड़ा। उन्होंने जनता को भटकाने के लिए कैलेंडर में बदलाव किया ताकि वे अपने शासनकाल को बढ़ा-चढ़ा कर दिखा सकें।

इसके अलावा, धार्मिक कारणों से भी कैलेंडर को बदला गया। कुछ धार्मिक पर्वों और त्योहारों के समय निर्धारण में बदलाव की जरूरत पड़ी, जिसे कैलेंडर सुधार के नाम पर लागू किया गया। इन सभी कारणों ने मिलकर 13 महीने वाले प्राकृतिक कैलेंडर को लगभग भुला दिया। यह जानना जरूरी है कि हमारे समय की गणना पूरी तरह सही नहीं है। हमें इतिहास की इस साजिश को समझकर विज्ञान और प्रकृति के करीब आने वाले कैलेंडर की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। 13 महीने वाला कैलेंडर विज्ञान और प्रकृति के लिहाज से ज्यादा सही है और अगर इसे अपनाया जाए तो हमारी ज़िंदगी में बेहतर तालमेल आ सकता है। दोस्तों, यह रहस्य आज भी छुपा हुआ है कि हमारा कैलेंडर असल में 13 महीनों वाला था और कैसे सत्ता, राजनीति और धर्म ने इसे बदला। इथियोपिया जैसे देश अब भी इस प्राचीन प्रणाली को मानते हैं और हमसे कई साल पीछे चल रहे हैं। ये तथ्य हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि हमारे समय की गणना कितनी सटीक है और क्या हमें पुराने वैज्ञानिक और प्राकृतिक तरीकों को अपनाना चाहिए।
मिलेंगे अगली Interesting खबरों के साथ। तब तक बने रहिए खोजी नारद के साथ।

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